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मंगलवार, 20 नवंबर 2007

तनमन

विवेक जाग्रत होने पर मिलता है सुख

विवेक के अभाव में हम अपने कर्त्तव्यों का भलीभांति पालन नहीं कर पाते। अपनी इच्छाओं और वासनाओं के वशीभूत होकर इच्छानुसार कार्य करते रहकर सुख पाने का भ्रम पाले हुए जीवन बिता देते हैं। विवेक जाग्रत हो जाए तो अनेक अनर्थ स्वतः टल जाते हैं। बुरे कार्य और आदतें एक झटके में छूट जाते हैं जिससे अपने साथ-साथ औरों को सुख मिलता है।

हमारे लगभग सभी दुःखों, क्लेशों, अनर्थों आदि के मूल में विवेक की ही बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विवेक की कमी के कारण या अपनी विवेक शक्ति का समुचित उपयोग न कर पाने के कारण ही हम अनेक प्रकार के कष्ट भोगते हुए पश्चाताप की आग में जलते रहने को विवश होते हैं।
सृष्टि का निर्माण जड़ और चेतन के मेल से हुआ है। परमात्मा चेतन है और जगत जड़ है। सुख-दुःख, लाभ-हानि, अच्छा-बुरा, जीवन-मरण आदि आपस में घुलमिल गये हैं। इनमें से सार-असार, नित्य-अनित्य, जड़-चेतन, उपयोगी अनुपयोगी आदि को अलग-अलग कर समझने की हितकारी कला का नाम ही विवेक है।
सत्, असत्, शाश्ववत, नश्वर, नित्य, अनित्य आदि का विवेक हो जाने पर अनेक प्रकार के दुःखों से सहज ही बचा जा सकता है। सत्संग, स्वाध्याय, ध्यान और चिन्तन-मनन से विवेक को जाग्रत तथा परिपक्व किया जा सकता है। विवेक परिपक्व होने पर जगत के व्यवहार का अनुभव भी बदल जाता है। वह सुखद और शीतल हो जाता है। तब दुःख दुःख नहीं रहता, चिन्ता से मुक्ति मिल जाती है के साथ-साथ दैवी आनन्द की प्राप्ति होती है।
होता यह है कि हम प्रायः विवेक की अनदेखी कर या उस पर पर्दा डालकर अनगिनत क्रियाकलापों में लिप्त रहते हैं। विवेक के अभाव में हम अपने कर्त्तव्यों का भलीभांति पालन नहीं कर पाते। अपनी इच्छाओं और वासनाओं के वशीभूत होकर इच्छानुसार कार्य करते रहकर सुख पाने का भ्रम पाले हुए जीवन बिता देते हैं। विवेक जाग्रत हो जाए तो अनेक अनर्थ स्वतः टल जाते हैं। बुरे कार्य और आदतें एक झटके में छूट जाते हैं जिससे अपने साथ-साथ औरों को सुख मिलता है।
जिसे हम अपने विवेक के अनुसार बुरा निर्धारित कर देते हैं, उससे मुक्ति भी पाना चाहते हैं और मुक्त होकर सुख भी पाना चाहते हैं। मगर परेशानी तब होती है जब हम अपने कमजोर मन और इच्छाशक्ति के बल पर उस बुराई से धीरे-धीरे यानी किस्तों में मुक्ति पाने की जुगत भिड़ाते हैं। इससे असफलता के सिवा कुछ प्राप्त नहीं होता। अपने विवेक का उपयोग करते हुए समय बरबाद किये बिना एक झटके से बुराई से मुक्त होने में ही भलाई है। निरन्तर टालते जाने से किसी प्रकार का लाभ नहीं होने वाला। इसके लिए धुन का पक्का होना बड़े काम आता है।
विवेकी व्यक्ति ही सच्चा सुख पाने में सदा समर्थ और सफल होता है।
टी.सी. चन्दर/
rabhasakshi.com


सावधान रहिए गर्मी के मौसम में
भूलकर भी बाजार में उपलब्ध बहुप्रचारित बोतलबन्द कोला या अन्य शीतल पेयों का सेवन नहीं करना चाहिए। ये शीतल पेय शरीर को अनेक प्रकार से हानि पहुंचाते हैं, विशेष रूप से बच्चों को इन शीतल पेयों से बच्चों को बचाना चाहिए। किसी प्रकार से लाभ पहुंचाने की बजाय ये पेय बच्चों के विकसित होते शरीर और हड्डियों के लिए घातक सिद्ध हो रहे हैं। आज अधिकांश बच्चे फास्ट फूड और इन शीतल पेयों के निरंकुश उपयोग के कारण मोटापे और कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। निम्न, मध्य और सम्पन्न परिवारों में इन्हीं घातक शीतल पेयों का प्रचलन बढ़ रहा है। निःसन्देह ये पेय गैरजरूरी और हानिकारक हैं। इनसे तात्कालिक रूप से कुछ राहत तो मिलती है पर अन्ततः हानि ही अधिक पहुंचाते हैं।
गर्मी के मौसम में तेज धूप रीर और ज्ञान तन्तुओं के लिए हानिकारक होती है। किसी जरूरी कार्यवश यदि धूप में बाहर निकलना ही पड़े तो आवश्यक उपाय करके ही जाना चाहिए ताकि तेज धूप, लू आदि से बचाव हो सके। सुबह उठकर शौच जाने से पहले चाय की जगह पिया गया 1-4 गिलास सादा पानी पूरे दिन शरीर के काम आता है। घर से निकलने से पहले भी पर्याप्त मात्रा में साफ पानी अवश्य पीना चाहिए। लू से बचाव का यह एक सहज उपाय है। कभी धूप में चलकर आते ही पानी या शीतल पेय नहीं पीना चाहिए। कम से कम 10-15 मिनट छाया में रुकना चाहिए। देर रात तक कभी जागना भी पड़े तो 1-1 घंटे बाद पानी पीते रहना चाहिए। इससे पित्त व कफ के प्रकोप से बचाव रहेगा। सुबह जल्दी जागकर प्रातःकाल की शीतल हवा का सेवन करना चाहिए। सीधी धूप से बचाव रखें। सिर में बादाम रोगन, चमेली, नारियल या लौकी के बीजों का तेल लगाएं। भारी, बासी, दूषित और गरिष्ठ भोजन से बचना चाहिए। इसके अलावा आवश्यकता से अधिक भोजन भी नहीं करना चाहिए।

जिन लोगों की पाचन शक्ति कमजोर है यानी प्रायः कब्ज बनी रहती है उन्हैं छिलके सहित मूंग की दाल और चावल (बराबर मात्रा में या दाल कुछ अधिक लें) से धीमी आंच पर बनी खिचड़ी ही भोजन के रूप में लेनी चाहिए। खिचड़ी के साथ चटनी या थोड़े दही का उपयोग भी किया जा सकता है। खिचड़ी के सेवन से जल्दी ही पाचन संस्थान ठीक हो जाता है। रात को जल्दी भोजन करना और भोजन के बाद कुछ समय टहलना भी जरूरी है। खासतौर पर शाम या रात को भारी और देर से पचने वाला तेज मिर्चमसाले युक्त भोजन नहीं करना चाहिए। अन्यथा कब्ज, गैस, एसिडिटी आदि व्याधियां सामने आ खड़ी होती हैं। इसलिए मौसम के अनुसार उपयुक्त और सुपाच्य भोजन को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। मौसमी कच्ची खाई जा सकने वाली फल-सब्जियों का सेवन नियमित रूप से अवश्य करना चाहिए। इन बातों का हर मौसम में ध्यान रखना और गर्मी के मौसम में खास ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

दिनभर में कई बार पानी, शर्बत या अन्य तरल पदार्थ लेते रहना आवश्यक होता है अन्यथा शरीर में पानी की कमी हो जाती है। धूप से बचाव के लिए सिर पर कोई कपड़ा, टोपी, साफा, पगड़ी रखनी चाहिए या छतरी से छाया रखनी चाहिए। दोपहर के बाद शर्बत, शिकंजी, ठण्डाई, फलों का रस, ताजा दही से बनी मीठी या नमकीन लस्सी, बेल का शर्बत आदि तरल पदार्थ सुविधानुसार लेने चाहिए। भूलकर भी बाजार में उपलब्ध बहुप्रचारित बोतलबन्द कोला या अन्य शीतल पेयों का सेवन नहीं करना चाहिए। ये शीतल पेय शरीर को अनेक प्रकार से हानि पहुंचाते हैं, विशेष रूप से बच्चों को इन शीतल पेयों से बच्चों को बचाना चाहिए। किसी प्रकार से लाभ पहुंचाने की बजाय ये पेय बच्चों के विकसित होते शरीर और हड्डियों के लिए घातक सिद्ध हो रहे हैं। आज अधिकांश बच्चे फास्ट फूड और इन शीतल पेयों के निरंकुश उपयोग के कारण मोटापे और कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। निम्न, मध्य और सम्पन्न परिवारों में इन्हीं घातक शीतल पेयों का प्रचलन बढ़ रहा है। निःसन्देह ये पेय गैरजरूरी और हानिकारक हैं। इनसे तात्कालिक रूप से कुछ राहत तो मिलती है पर अन्ततः हानि ही अधिक पहुंचाते हैं।
गर्मी के मौसम में चलने वाली आग की लपट सी लू शरीर को काफी नुकसान पहुंचाती है। सूरज की तेज गर्मी के कारण पृथ्वी का जलीय अंश कम होता जाता है जिससे मनुष्य को अपने ’ारीर के सौम्य अंश को सही रूप में बचाए रखने के लिए खूब पानी के अलावा पोषक और ठंडक देने वाले तरल पदार्थों का नियमित सेवन करते हुए अपने खानपान का भी ध्यान रखना जरूरी हो जाता है। इस मौसम में ठण्डाई, सत्तू, शर्बत, शिकंजी, लस्सी, खीर, दूध की लस्सी, छिलकायुक्त मूंग की दाल, घिया (लौकी), ताजी बनी चोकर सहित मोटे आटे की रोटी, पोदीना, चैलाई, परवल, केले की सब्जी, अनार, अंगूर, नींबू, तरबूज, ककड़ी, तरबूज के छिलकों की सब्जी, हरा धनिया, कैरी (कच्चा आम) को भून या उबालकर बनाया गया मीठा पना, गुलकन्द, पेठा, बेल का शर्बत आदि के सेवन का खास ध्यान रखना चहिए।
वात-पित्त के प्रकोप से बचाव के लिए हरड़ के साथ गुड़ का सेवन करना चाहिए। गर्मी में तीखे, खट्टे, कसैले, तेज मिर्चमसाले व तले पदार्थ, चाट-पकौड़ी, अमचूर, अचार, सिरका, शराब, अधिक ठंडे पदार्थ आदि से बचकर रहना ही अच्छा है। फ्रिज के अधिक ठंडे पानी के स्थान पर मिट्ठी से बनी सुराही या घड़े में रखा ठंडा पानी ही पीना चाहिए जो हमारे शरीर की आव’यकता के सर्वथा अनुरूप् होता है। अन्यथा सर्दी-जुकाम, गले की परेशानी, टांसिल दांतों-मसूढ़ों की कमजोरी आदि व्याधियों से दो-चार होना पड़ सकता है। देर रात तक जागने, सुबह देर तक सोने, अधिक शारीरिक श्रम करने, दिन में सोने, भूखा-प्यासा रहने आदि इस मौसम में खास तौर से बचना चाहिए।
इस प्रकार कुछ सावधानियां और कुछ सुरक्षात्मक उपाय अपनाने से गर्मी के मौसम का कष्ट कम करते हुए समुचित आनन्द उठाया जा सकता है।
टी.सी. चन्दर/www.prabhasakshi.com



मुस्कान में ना नुकसान
शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति भी प्रसन्नता और हंसी का दामन थामकर नयी
ऊर्जा और शक्ति पा लेता है। मन में प्रसन्नता, चेहरे पर मुस्कान और हंसी हमारे
शरीर की विभिन्न क्रियाओं को सुचारु रूप से कार्य करने को प्रेरित करती हैं।
इससे हमारा तन और मन दोनों स्वस्थ हो जाते हैं।

हर व्यक्ति के जीवन में दुख-अवसाद कभी न कभी आते ही हैं। शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसने कभी दुख या परेशानी न झेली हो। विपत्ति ने उसे कष्ट न पहुंचाया हो। लेकिन दुख, कष्ट, परेशानी, विपत्ति आदि के दिन हमेशा नहीं रहते। अमावस के बाद उजियारी रात आती ही है। अँधेरे के बाद उजाला आना निश्च है, जो पूरे जगत को रोशनी से भर देता है। इसी तरह हमारी मुस्कान, प्रसन्नता और हँसी हमें ही नहीं, हमारे सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करती है, उन्हें सुख प्रदान करती है। सुख और दुख हर व्यक्ति के जीवन में आते और जाते रहते हैं, जो दोनों ही में प्रसन्नता, मुस्कान और हासपरिहास का दामन न छोड़े वही सुखी जीवन बिता सकता है।
हंसी ही मनुष्य की आन्तरिक प्रसन्नता को प्रकट करती है। इससे समस्त शरीर की रक्तवाहिनियाँ सक्रिय हो जाती हैं जिससे उनका अच्छा व्यायाम हो जाता है। रक्तप्रवाह बढ़ जाता है। श्वांस संस्थान ताजादम हो जाता है। आंखों में चमक आ जाती है। फ़ैंफड़े ताजी हवा पाते हैं, गंदी हवा बाहर निकल जाती है। इस प्रकार हंसी समस्त शरीर की क्रियाओं को सुचारु बना देती है। जब ऐसा होता है तो शरीर स्वस्थ रहता है। यानी स्वस्थ शरीर के लिए हंसी और प्रसन्नता बिन मोल के सर्वश्रेष्ठ विटामिन हैं जो किसी खेत या फेक्टरी से नहीं मिल सकते। आ कहना है कि प्रसन्नचित्त लोग ही चिरकाल तक जीवित रहते हैं। शारीरिक रूप से ही नहीं, मन से और यश-नाम से भी वे ही लोगों की स्मृति में रहते हैं जो खुश रहते हैं। गुस्सैल, चिढ़चिढ़े, मायूस, दुखड़े सुनाने वाले और चिंतित दिखने वाले लोगों लो भला कौन याद रखेगा! इस तरह हंसमुख प्रसन्न रहने वाले लोगों को ईश्वर प्रदत्त आयु के बाद भी लंबे समय तक रिश्तेदार, मित्र तथा शुभचिंतक जिंदा बनाए रखते हैं।
एक रोगी भी अपने डॉक्टर से उम्मीद करता है कि वह हंसमुख हो। अपनी खुशमिजाजी से एक चिकित्सक अपने रोगी को दी जाने वाली दवाओं का असर बढ़ा देता है और वह जल्दी ठीक रोगमुक्त करता है। क्रोध, चिंता, तनाव, चिढ़चिढ़ापन, अंहकार आदि जिस चिकित्सक में होंगे वह अच्छा चिकित्सक हो ही नहीं सकता। उल्लेखनीय है कि आधे से अधिक रोग मानसिक ही होते हैं। हर रोगी की चाहत होती है कि उससे कोई दो पल हंसकर बात कर ले, मुस्कराए। इस 'दवा' से अनेक गंभीर मानसिक रोगी अपेक्षाकृत कम समय में ठीक हो जाते हैं।
शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति भी प्रसन्नता और हंसी का दामन थामकर नयी ऊर्जा और शक्ति पा लेता है। मन में प्रसन्नता, चेहरे पर मुस्कान और हंसी हमारे शरीर की विभिन्न क्रियाओं को सुचारु रूप से कार्य करने को प्रेरित करती हैं। इससे हमारा तन और मन दोनों स्वस्थ हो जाते हैं। झगड़ालू, घमंडी, स्वार्थी, क्रोधी जैसे व्यक्ति घर-परिवार के साथ-साथ समाज के लिए भी ठीक नहीं होते। सो, मुस्कान है सबके लिए वरदान!
प्रसन्नता आयु बढ़ाती है, यौवन लाती है, आशाएं लाती है, नयी ऊर्जा का संचार करती है। फोटोग्राफर भी यूँ ही नहीं कहता-स्माइल प्लीज या ज़रा मुस्कुराइए! चेहरा किसी का भी हो, मुस्कराता हुआ चेहरा सबको पसंद आता है। इससे मुस्कान का गुणात्मक प्रचार-प्रसार भी होता है।
मुस्कान के अलावा खूब खुलकर हंसने के किसी अवसर को हाथ से मत जाने दीजिए और सदा ऐसे मौकों की तलाश में रहिए। दिल से मुस्कुराइए। इस आनंद और अनूठे संगीत का आनंद आपके साथ-साथ सभी उठाएंगे। आपके रोने-झींकने में कोई साथ देने वाला नहीं होगा।
स्वेट मार्डेन ने कहा है कि हंसी के फूल ही तो सफलता के फल होते हैं। रोजाना कई बार खुलकर हंसने का नियम बनाइए। अपने चेहरे से मुस्कान हटने मत दीजिए। परिवर्तन आपको खुद दिखाई देगा। आपकी मुस्कान और हंसी के आगे कष्ट और परेशानियाँ टिक ही नहीं सकते। प्रसन्नता, मुस्कान और हंसी को अपने तन-मन में बसाइए और निश्चिंत हो जाइए।

* ता.च. चन्दर

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व्यायाम को बनाएं दिनचर्या का हिस्सा

'पहला सुख निरोगी काया' वाली बात मात्र सुनने-कहने के लिए नहीं, अपनाने के लिए होती है। कुछ सामान्य स्वास्थ्य नियमों को अपनाने से ही पर्याप्त लाभ प्राप्त किया जा सकता है। प्रतिस्पर्द्धा के इस युग में तमाम ऐसी स्तिथियों का सामना करना पङता है जो अनचाही पर अनिवार्य होती हैं मानसिक और शारीरिक तनाव से सामना होना सामान्य बात है।


'क्या करें, समय ही नहीं मिलता।' यही बात प्राय: सुनने को मिलती है। अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अधिकांश लोगों के पास समय नहीं। पर थोड़ा ध्यान देने पर ही असलियत सामने आ जाती है। गपशप और ऐसे ही कुछ अन्य कार्यों के चलते लोगों के पास समय ही नहीं बचता। वैसे इसके मूल में है इच्छाशक्ति की कमी और अपने ही हित की अनदेखी करना। दरअसल आज समय की कमी दिखाना भी एक फैशन जैसा बन गया है।

घटना-दुर्घटना आदि को छोड़ अस्वस्थ होने पर डाक्टर की शरण में जाना सामान्यत: टाला जा सकता है। आज की व्यस्त, भागमभाग, तनावभरी दिनचर्या में से थोड़ा समय अपने शरीर के लिए निकालना अब और भी जरूरी हो गया है। इसमें टालमटोल करना अपने पैर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। आवश्यक कार्यों, गपशप, मनोरंजन, स्वादिष्ट खानपान आदि के साथ-साथ सुन्दर शरीर के लिए भी कुछ समय तय करना जरूरी है। नि:संदेह यह समय थोड़े व्यायाम के लिए देना घाटे का सौदा नहीं होगा।

'पहला सुख निरोगी काया' वाली बात मात्र सुनने-कहने के लिए नहीं, अपनाने के लिए होती है। कुछ सामान्य स्वास्थ्य नियमों को अपनाने से ही पर्याप्त लाभ प्राप्त किया जा सकता है। प्रतिस्पर्द्धा के इस युग में तमाम ऐसी स्तिथियों का सामना करना पङता है जो अनचाही पर अनिवार्य होती हैं मानसिक और शारीरिक तनाव से सामना होना सामान्य बात है। हड़बड़ी, बदली हुई खानपान की आदतों और जीवनशैली के कारण प्राय: कई परेशानियों से दो-चार होना पङता है। थोडी सी जागरूकता, सावधानी, कुछ नियमित व्यायाम, योग, प्राणायाम, टहलना आदि अपनाकर वर्त्तमान तथा आने वाले जीवन को सुखद बनाया जा सकता है।

कब्ज़, जोडों का दर्द, रक्तचाप, रक्त प्रवाह आदि से जुडी तमाम समस्याएँ से नियमित व्यायाम ही मुक्त रख सकता है. उचित व्यायाम से रीढ़ की हड्डी में लचीलापन आता है. मधुमेह जैसी बीमारी पर भी अंकुश है. शरीर में उत्साह और स्फूर्ति का संचार बना रहता है. शरीर स्वस्थ, सुडौल तथा सुन्दर बना रहता है. चेहरे का सौन्दर्य और तेज आपके श्रीमुख के बारे में खुद पूरा परिचय दे देता है।

असंतुलित, अनुचित, अपोषक, अधिक चिकनाईयुक्त आदि जैसे भोजन से मोटापे का आगमन होता है जो स्वयं ही एक बड़ी बीमारी है। शरीर में पोषक तत्वों की कमी के परिणाम देरसबेर सामने आते ही हैं। आज युवा शीघ्र अपने शरीर को गठीला बनाकर प्रदर्शन करने के लिए जिम और तरह-तरह के पाउडर-दवाओं को अपनाते हैं। शरीर को गठीला बनाने की अंधी दौड़ में वे अपने लाभ-हानि की और अपेक्षित ध्यान नहीं देते हैं। बिना सही-गलत की जानकारी प्राप्त किये शीघ्र जोरदार परिणाम पाने के लिए जरूरत से ज्यादा कसरत करते रहते हैं। जबकि योग्य प्रशिक्षक की देखरेख और निर्देशन में ही व्यायाम करना चाहिए। अन्यथा कभी-कभी ऐसी हानि उठानी पड़ जाती है जिसकी भरपाई कर पाना भी कठिन हो जाता है।

किसी अच्छी पुस्तक या योग्य प्रशिक्षक से पर्याप्त जानकारी प्राप्त करने के बाद शुभारम्भ करना चाहिए। प्राणायाम आदि की विभिन्न क्रियाएँ अपनाना लाभदायक होता है। इसके साथ-साथ जल्दी सोना, जल्दी जागना, सुबह उठने पर 2-3 गिलास आवश्यकतानुसार सादा या गुनगुना पानी पीना, व्यायाम, नाश्ता, भोजन आदि के बारे में तय करना ही चाहिए। नाश्ते में दूध, दही, अंकुरित अनाज-दाल, दलिया, फलों का रस आदि को ही प्रमुखता देना चाहिए। भोजन शाकाहारी ही बेहतर होता है। हरी सब्जियों, दालों, दही, मौसमी फल और सब्जियों, मोटे आटे (चोकर सहित) से बनी रोटियों को भोजन में प्रमुखता दें। इसके लिए किसी अच्छी पुस्तक या डायटीशियन से जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

* ता.च. चन्दर

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