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शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

महर्षि दयानन्द

महर्षि दयानन्द को नमन
(187वां जन्मोत्सव, 27 फ़रवरी 2011)
दयानन्द जी ने गौ हत्या का दृढ़ता से विरोध किया। अपनी पुस्तक ‘गौ करुणानिधि’ में स्पष्ट किया है कि मांस भक्षण से मानव मात्र का अपकार होता है, जीवों का पालन करने से प्राणी मात्र का उपकार होता है। स्वामी दयानन्द जी ने नारी शिक्षा आरम्भ करायी।उनको वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। आज यह महर्षि की ही देन है कि देश की महिलाएं अबला से सबला बन गयीं हैं। उन्होंने विधवाओं का पुनर्विवाह कराया। उन्होंने छुआछूत का सदा विरोध किया। 
उन्नीसवीं सदी में चारों ओर अराजकता का बोलबाला था। नर हत्या को खेल समझने वाले ठगों के आतंक से जनता सदा त्रस्त रहती थी। सामाजिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि चार आश्रमों और चार वर्णों की दृढ़ नींव पर टिके समाज की एक-एक चूल हिल रही थी। छुआछूत ने समाज को हजारों भागों में बांट दिया था। कन्याओं को गला घोंटकर मार दिया जाता था। विधवाओं को ढोल-धमाकों के साथ जबर्दस्ती सती कर देने को परम धर्म समझा जाता था। हजारों वर्ष के अपने पतन के सिलसिले को देखकर भारत मां खून के आंसू रो रही थी। ऐसे घनघोर अंधेरे में अचानक एक बिजली सी चमकी, रेगिस्तान में जैसे अमृत की धारा बह गयी। भारत मां को एक लाल मिल गया जिसको महर्षि दयानन्द सरस्वती के नाम से जाना जाता है।
सन्‌ 1824 में फ़ाल्गुन कृष्ण पक्ष दशमी को गुजरात में टंकारा ग्राम में श्रीकृष्ण जी के घर एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम मूलशंकर रख गया। बाद में शिक्षा व योग्यता के आधार पर विद्वानों ने इनको दयानन्द सरस्वती नाम दिया। वह प्रकाश का रक्षक एवं प्रचारक था। वह प्राणी मात्र का रक्षक था। वह सांसारिक प्रलोभनों और भोगों से लोहा लेने वाला धुरन्धर योद्धा और विजेता था। दयानन्द वह महामानव थाजिसने अध्यात्म को क्रियात्मक रूप देने में अभूतपूर्व सफ़लता प्राप्त की। उन्होंने कहा था कि योगी बनो, साथ ही कर्मयोगी भी बनो।वेदों की ओर लौटो। आत्मज्ञानी बनो परन्तु मानव भी बनो। वह उन व्यक्तियों में से थे जिन्हें वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों का अध्ययन करके देवताओं की श्रेणी में अग्रणी माना जाता था। वे मानव जाति की प्रेरणा और आदर के पात्र रहे, आज भी हैं और सदा रहेंगे।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सर्वप्रथम स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने कहा था कि सुराज से स्वराज्य श्रेष्ठ है। स्वतन्त्रता संग्राम में 85% लोग उनके अनुयायी थे। कॉंग्रेस का इतिहास इस बात को प्रमाणित करता है। जितने भी शहीद हुए हैं उनके बारे में पता चलता है कि उनके प्रेरणास्रोत महर्षि दयानन्द ही थे।
अन्याय और काले धन का विरोध कर रहे योगगुरू के रूप में विख्यात बाबा रामदेव महर्षि दयानन्द सरस्वती के ही परम भक्त हैं। दयानन्द जी ने गौ हत्या का दृढ़ता से विरोध किया। अपनी पुस्तक ‘गौ करुणानिधि’ में स्पष्ट किया है कि मांस भक्षण से मानव मात्र का अपकार होता है, जीवों का पालन करने से प्राणी मात्र का उपकार होता है। स्वामी दयानन्द जी ने नारी शिक्षा आरम्भ करायी। उनको वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। आज यह महर्षि की ही देन है कि देश की महिलाएं अबला से सबला बन गयीं हैं। उन्होंने विधवाओं का पुनर्विवाह कराया। उन्होंने छुआछूत का सदा विरोध किया। वे मानते थे कि जन्म से कोई अछूत नहीं होता। स्वामी जी ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और जीव पूजा का समर्थन किया।  वे मानते थे कि भारत की गुलामी के मूल में मूर्ति पूजा ही रही है। उन्होंने एक ईश्वर की पूजा पर बल दिया जिसका मुख्य नाम है ‘ओ३म्‌’ । उन्होंने लोगों को यज्ञ करने की प्रेरणा दी। उन्होंने पाखण्ड और अन्धविश्वास का हमेशा विरोध किया। शास्त्रार्थ किये। विश्वभर के विद्वानों को उनके आगे घुटने टेकने पड़े। वे एक महान्‌ योद्धा थे। उन्होंने वेदों का भाष्य हिन्दी में किया। स्वामी दयानन्द का प्रमुख ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ है जिसमें ईश्वर के 108 नामों की व्याखा व 1576 वेद मन्त्रों का विवरण दिया गया है।
उन्होंने सन्‌ 1875 में बम्बई (मुम्बई) में आर्य समाज की स्थापना की। आज आर्य समाज के करोड़ों सदस्य महर्षि के काम को आगे बढ़ा र्हैं। महात्मा गान्धी ने भी लिखा है- महर्षि दयानन्द सरस्वती भारत के आधुनिक ॠषियों व सुधारकों में श्रेष्ठ और अग्रणी थे। उनके कारण ही आज भारत  पुन: विश्व गुरू बनने को अग्रसर हो रहा है।
धन्य हैं ऋषि हैं आप, आपने जग जगा दिया। महर्षि दयानन्द सरस्वती के 187वें वर्ष पर हम उन्हें शत्‌शत्‌ नमन करते हैं।
• सुरेश आर्य
मन्त्री, आर्य समाज, वृन्दावन गार्डन, सहिबाबाद, उ.प्र.
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गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

शनिवार कला मेला

एक था शनिवार कला मेला

सन् 1982 में दिल्ली में आयोजित हुए एशियाई खेलों के चक्कर में सुरक्षा व्यवस्था के चलते प्रशासन को बहाना मिल गया और इसकी गाज गिरी कला मेले पर। इस तरह कला, कलाकार और आम लोगों को आपस में जोड़ने वाले एक अच्छे प्रयास ने दम तोड़ दिया।

देश की राजधानी के कुछ कलाकारों ने मिलकर कला और कलाकारों का आमजन से सीधा साक्षात्कार कराने के दिशा में एक बेहतरीन कार्य किया था। 80 के दशक में दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस स्थित सेन्ट्रल पार्क में एक अनूठी कला प्रदर्शनी के नियमित आयोजन का शुभारम्भ किया था। भारीभरकम कला दीर्घाओं के विपरीत खुले आकाश तले कलाकृतियों का प्रदर्शन और वहीं कलाकारों की उपस्थिति लोगों को बहुत पसन्द आयी। कलाकृतियों के साथ-साथ गिरिधर राठी की कविताओं और उनके साथ चित्रांकनों की प्रस्तुति भी एक अच्छा प्रयोग था।


स्थानीय कला प्रेमियों के अलावा देशी-विदेशी पर्यटकों को भी इस कला प्रदर्शन के आयोजन ने सहज ही आकर्षित किया। हर शनिवार को लगने वाले इस कला मेले या प्रदर्शनी का लोग इन्तजार करते थे। छोटे-बड़े ईंट-पत्थर के टुकड़ों और सीढ़ियों के सहारे टिकी कलाकृतियों का अवलोकन करते हुए दर्शक अनूठे आनन्द का अनुभव करते थे। वे पास ही जमीन पर बैठे कलाकारों से कला और उनकी कलाकृतियों के बारे में निःसंकोच बातें करते, तरह-तरह के प्रश्न करते और अपनी जिज्ञासा शान्त करते।

इस कला मेले के बारे में प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी खूब चर्चा हुई। हालांकि तब आज की भांति इतने सारे टीवी चैनल नहीं थे। दूरदर्शन पर शनिवार कला मेले को लेकर कार्यक्रम दिखाए जाते थे। स्थानीय अखबारों में इस खुले आकाश तले हर शनिवार आयोजित होने वाली कला प्रदर्शनी के बारे में छपता रहता था। इस प्रकार जानकारी पाकर दूर-पास के अनगिनत लोग कलाकृतियां देखने कनॉट प्लेस के सेन्ट्रल पार्क में आया करते थे। शनिवार या शनिवारीय कला मेला के नाम से जाना जाने वाला यह कला मेला काफी लोकप्रिय हो गया था। इसी प्रकार ललित कला महाविद्यालय के छात्रों और कुछ उत्साही युव कलाकारों ने चलती-फिरती कला प्रदर्शनी की शुरूआत भी की थी। ये लोग राजधानी के अलग-अलग भागों में हर शनिवार चित्र प्रदर्शनी लगाते थे।


इस कला मेले में चूंकि कलाकार अपनी कलाकृतियों के साथ स्वयं उपस्थित रहते थे अतः अनेक दर्शक अपने पोर्ट्रैट उनमें से कई कलाकारों से बनवाया करते थे। यही नहीं अनेक लोग अपने इष्ट मित्रों से मिलने के लिए इस कला मेले के स्थान ही तय कर देते थे। यहां जमीन आकर जमीन पर बैठकर अपनी कलाकृतियों को प्रदर्शित करने वालों में अनेक जानेमाने कलाकार थे। अनिल करंजई, सूरज घई, गिरधर राठी, सपन विश्वास, सतीश चैहान, कार्टूनिस्ट चन्दर (यानी मैं, तब दिल्ली के ललित कला महाविद्यालय में बीएफ़ए का छात्र था), अशोक कुमार सिंह, अशेक कुमार आदि के अलावा ललित कला महाविद्यालय, जामिया मिल्लिया, शारदा वकील, शिल्प कला विद्यालय आदि के अनेक छात्र कलाकार यहां नियमित रूप से आया करते थे। इनके अलावा देशी-विदेशी पर्यटक और अन्य कला प्रेमियों का हर शनिवार अच्छा जमावड़ा रहता था।


जहां अनगिनत लोग इस प्रयास को एक अच्छी गतिविधि मानते थे। नयी दिल्ली नगर पालिका और पुलिस ने इस कला मेले को अनेक बार हटाने, उजाड़ने या बन्द कराने के लिए बहुत कोशिशें कीं पर कला प्रेमियों के सक्रिय और कड़े विरोध के चलते उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। सन् 1982 में दिल्ली में आयोजित हुए एशियाई खेलों के चक्कर में सुरक्षा व्यवस्था के चलते प्रशासन को बहाना मिल गया और इसकी गाज गिरी कला मेले पर। इस तरह कला, कलाकार और आम लोगों को आपस में जोड़ने वाले एक अच्छे प्रयास ने दम तोड़ दिया।

एशियाई खेलों के समापन के बाद भी तमाम दिक्कतों के चलते पुनः शनिवार कला मेला शुरू नहीं हो सका। मगर लोगों के मन-मस्तिष्क में इतना समय बीत जाने के बाद भी शनिवारीय कला मेला विद्यमान है। अब भी मुझे कभी-कभी उस कला मेले को याद करने वाले कला प्कौरेमी मिल जाते हैं। न जाने कब कोई कलाकार इससे प्रेरणा लेकर पुनः शनिवारीय कला मेला जैसा कोई आयोजन शुरू कर दे!
• सभी चित्र: चन्दर

इस कला मेले में चूंकि कलाकार अपनी कलाकृतियों के साथ स्वयं उपस्थित रहते थे अतः अनेक दर्शक अपने पोर्ट्रैट उनमें से कई कलाकारों से बनवाया करते थे। यही नहीं अनेक लोग अपने इष्ट मित्रों से मिलने के लिए इस कला मेले के स्थान ही तय कर देते थे। यहां जमीन आकर जमीन पर बैठकर अपनी कलाकृतियों को प्रदर्शित करने वालों में अनेक जानेमाने कलाकार थे

बुधवार, 1 सितंबर 2010

गुलामी स्मृति खेल

गुलामी स्मृति खेलों ने शेर को बनाया बाघ


गुलामी स्मृति खेलों के शुभंकर या मस्कट शेरा या शेर को देखिए, वह शेर है ही नहीं अपितु बाघ या व्याघ्र या चीता है। यदि यह शेर है तो आप बाघ या व्याघ्र या चीता किसे कहेंगे? शेरा हिन्दी के शब्द शेर से बनाया गया है पर इस नाम को अंग्रेजी में टाइगर कहा गया है।

हम बचपन से ही सुनते पढ़ते आ रहे हैं कि जंगल में बहुत से जानवर रहते हैं जिनमें एक शेर भी होता है। उसे जंगली जानवरों का राजा या जंगल का राजा कहा जाता है। शेर को अंग्रेजी में लायन (lion) कहा जाता है। इसी तरह एक अन्य जंगली जानवर होता है बाघ या व्याघ्र या चीता जिसे अंग्रेजी में टाइगर (tiger) कहा जाता है।


यह बड़ी प्रसन्नता की बात है कि जंगल के राजा शेर या शेरा को कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 का शुभंकर तैनात किया गया है। (कॉमनवेल्थ का अर्थ इस तरह समझा जा सकता है-किसी देश की सम्पूर्ण प्रजा, राष्ट्रमण्डल, अंग्रेजों के गुलाम रहे देशों के समूह और गेम्स यानी खेल, ऐसे आयोजन से अपनी गुलामी की स्मृति को ताज़ा रखा जाता है और इस बहाने मुट्ठी भर जुगाड़ू लोगों को जनता के पसीने की कमाई में से धनार्जन के पर्याप्त सुअवसर मिलते हैं। प्राय: अधिकांश काम तब किए जाते हैं जब समय कम रह जाता है ताकि जल्दी के चक्कर में काफ़ी ऊंची दरों पर काम कराया जाए।) हम लोग किसी पदक-प्रसिद्धि के लालच में नहीं फ़ंसते सो काम जल्दी पूरा करने की जल्दी भी नहीं होती, ऐसे में हमारे खिलाड़ियों को उपयुक्त स्टेडियम अभ्यास के लिए उपलब्ध कराने की जरूरत भी नहीं रह जाती। जब पदक हम ले लेंगे तो अन्य गुलाम देश क्या यहां झख मारने आयेंगे! जो हमें चाहिए वह हम समेटने में कुशल हैं ही!
चित्र: कॉमनवेल्थ गेम्स २०१० दिल्ली का शुभंकर शेरा

खैर, गुलाम स्मृति खेलों के शुभंकर या मस्कट (mascot) शेरा या शेर को देखिए, वह शेर है ही नहीं अपितु बाघ या व्याघ्र या चीता है। यदि यह शेर है तो आप बाघ या व्याघ्र या चीता किसे कहेंगे? शेरा हिन्दी के शब्द शेर से बनाया गया है पर इस नाम को अंग्रेजी में टाइगर कहा गया है। कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के जिम्मेदार पदाधिकारियों-सलाहकारों और उनका काम करने वाली सम्बन्धित एजेंसी की हिन्दी बह्त अधिक कमजोर है, इन लोगों ने मिलकर बाघ को शेर बना डाला है। इनके अनुसार शेर का अर्थ है टाइगर और चित्र के रूप में भी टाइगर ही स्वीकार है शेर नहीं। यानी बच्चों को यही बताया जाए कि अब शेर, शेर नहीं बाघ है और बाघ, बाघ नहीं शेर है या फ़िर शेर यानी टाइगर!


कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 की आधिकारिक वेबसाइटhttp://www.cwgdelhi2010.org/ में दियागया है-
Shera, mascot of the XIX Commonwealth Games 2010 Delhi, is the most visible face of the XIX Commonwealth Games 2010 Delhi. His name comes from the Hindi word Sher – meaning tiger.
(शेरा, 19वें राष्ट्रमण्डल खेल 2010 दिल्ली का शुभंकर, 19वें राष्ट्रमण्डल खेल 2010 दिल्ली सबसे अधिक दिखाई देने वाला चेहरा है। उसका नाम हिंदी शब्द शेर से लिया गया है- जिसका अर्थ है बाघ।)
चित्र: शेरा का ब्लॉग


और शेरा के ब्लॉगhttp://www.cwgdelhi2010.org/?q=node/1637 में भी स्पष्ट लिखा गया है-Name: Shera.......In Indian mythology, the tiger is associated with Goddess Durga, the embodiment of Shakti (or female power) and the vanquisher of evil. She rides her powerful vehicle – the tiger – into combat, especially in her epic and victorious battle against Mahishasur, a dreaded demon.

My name comes from the Hindi word Sher – meaning tiger. I represent the modern Indian.
चित्र: विकीपीडिया में शेरा


(नाम: शेरा....... भारतीय पौराणिक कथाओं में, बाघ देवी दुर्गा, शक्ति का अवतार (या महिला शक्ति) और बुराई की विजेता से जुड़ा है। महाकाव्य में विशेष रूप से एक भयानक राक्षस महिषासुर से निपटने में वह अपने शक्तिशाली वाहन बाघ की सवारी करती है।

मेरा नाम हिंदी शब्द शेर से आता है- जिसका अर्थ है बाघ। मैं आधुनिक भारतीय का प्रतिनिधित्व करता हूं।)

काश! शेर पढ़ा-लिखा होता तो अपने बारे में इन लोगों के अज्ञान को लेकर उन्हें अब तक सबक सिखा देता। यह वैसा ही है जैसे गांधी जी के फ़ोटो के नीचे सरदार पटेल का नाम लिख दिया जाए और अपनी कारस्तानी को सही सिद्ध करने के लिए कुतर्क भी दिए जाएं और लोगों के मन-मस्तिष्क में उसे बिठाने के लिए तरह-तरह के आधुनिक उपाय अपनाए जाएं। इस ओर देश के तमाम पढ़े-लिखे और विद्वान लोगों का ध्यान क्यों नहीं जाता, चारों ओर मौन स्वीकृति पसरी हुई है। जो जिम्मेदार लोग हैं वे अपने-अपने खेलों में लगे हुए हैं जिससे दुनिया भर में थू-थू हो चुकी है, हो रही है।

चित्र: शेर/सिंह, बाघ/व्याघ्र, शेरा और बाघ


सन्दर्भ के लिए दिए चित्रों के लिए बहुत-बहुत आभार

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

संकल्प

संकल्प से पाएं सफलता
ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि और अनेकानेक संसाधनों के अलावा संकल्प करने की क्षमता भी प्रदान की है। संकल्प कर लेने के बाद अपने पिछले कार्यों, व्यवहार, अभ्यास, आदतों आदि पर स्वयं अपने आलोचक बनकर दृष्टि डालनी चाहिए। संकल्प कर्म के बिना व्यर्थ है। गलत ढंग से और बिना कार्य योजना के कर्म करते जाना भी व्यर्थ है। स्वयं अपने प्रति, अपने संकल्प के प्रति और अपने प्रयासों के प्रति ईमानदार रहना बेहद जरूरी है। 

हम अपने आसपास नजर घुमाएं तो बड़ी आसानी से जान जाएंगे कि ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने दृढ़ संकल्प के बल पर मनचाही सफलता प्राप्त की है। दुनिया का इतिहास दृढ़ निश्चय के बल पर सफलता पाने वालों के उदाहरणों से भरा हुआ है। बिना विचलित हुए दृढ़ संकल्प और कर्म कर अनगिनत लोगों ने आश्चर्यजनक सुपरिणाम हासिल किये हैं। किसी परेशानी, मुसीबत और बाधा से उनके कदम रुके नहीं। वे अपने संकल्प को ध्यान में रख जुटे रहे और सफल हुए।

सफल होने वाले व्यक्ति किसी और ग्रह के वासी या हाड़-मांस के अलावा किसी और चीज के बने नहीं होते। वे सिर्फ यह जानते थे कि दृढ़ संकल्प के बल पर ही अपना लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि केवल दृढ़ संकल्प से काम चलने वाला नहीं है। लक्ष्य प्राप्ति के लिए निराशा से मुक्ति पाकर हर अनुकूल-प्रतिकूल स्थिति में अपना उत्साह बनाए रखना, समय का एक पल भी नष्ट न करना, परिश्रम से न घबराना, र्धर्य बनाए रखना, समुचित कार्ययोजना बनाकर अमल में लाना आदि पर ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है।

यदि आप किसी व्यक्ति की सफलता का रहस्य पूछें तो वह यही बताएगा कि उसने ठान लिया था कि वह ऐसा कर के या बन के रहेगा, चाहे कुछ भी हो जाए और इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े। दुनिया की कोई शक्ति उसे विचलित नहीं कर सकती। किसी व्यक्ति को हो सकता है सफलता आसानी से या संयोगवश मिल गयी हो। ऐसा अपवाद स्वरूप ही हो सकता है। इस प्रकार के किसी संयोग का इन्तजार में भाग्य के भरोसे बैठ सफलता पाने की सोचना मूर्खता के सिवा कुछ और नहीं। हां, उपयुक्त अवसर को कभी छोड़ना नहीं चाहिए। इसकी पहचान अपने विवेक और दूरदृष्टि से की जा सकती है।

इच्छाशक्ति संकल्प जैसे बहुमूल्य सिक्के का दूसरा पहलू है। यह हमारे संकल्प को दृढ़ता प्रदान करती है। इसलिए अपनी इच्छाशक्ति को कभी कमजोर नहीं होने देना चाहिए। इससे हमें निराशा जैसी नकारात्मक स्थिति से भी छुटकारा मिलता है। ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि और अनेकानेक संसाधनों के अलावा संकल्प करने की क्षमता भी प्रदान की है। संकल्प कर लेने के बाद अपने पिछले कार्यों, व्यवहार, अभ्यास, आदतों आदि पर स्वयं अपने आलोचक बनकर दृष्टि डालनी चाहिए। संकल्प कर्म के बिना व्यर्थ है। गलत ढंग से और बिना कार्य योजना के कर्म करते जाना भी व्यर्थ है। स्वयं अपने प्रति, अपने संकल्प के प्रति और अपने प्रयासों के प्रति ईमानदार रहना बेहद जरूरी है।

शिक्षा और करियर ही नहीं व्यवहार व आदतों के मामले में भी संकल्प महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संकल्प तथा कर्म से मिली सफलता किसी पैमाने से नापना व्यर्थ है। कोई सफलता छोटी या बड़ी नहीं। सफलता सफलता होती है और उसका अपना महत्व होता है। आवश्यक नहीं कि आप हर बार अपना संकल्प पूरा कर सफल होते चले जाएं। आज जो लोग हमें सफलता के शिखर पर बैठे दिखायी देते हैं वे ही जानते हैं कि वे कितनी बार असफल हुए हैं। पर असफताएं उन्हें विचलित नहीं कर सकीं। कुछ लोग, विशेष रूप से अनेक युवा थोड़ा असफल होने पर हिम्मत हार जाते हैं। ऐसे अनेक लोग नशे की शरण में चले जाते है और फिर अपनी कहानी औरों को सुनाते फिरते हैं। कोई उन्हें गम्भीरता से नहीं सुनता। अक्सर लोग मजाक ही उड़ाते हैं। नतीजा यह कि असफता से घबराने की जरूरत नहीं क्यों कि किसी व्यक्ति की बड़ी सफलता के पीछे अनेक छोटी-बड़ी असफलताएं हो सकती हैं जिनके बारे में प्रायः सभी लोग नहीं जान पाते हैं। असफल होने पर भी संकल्प, इच्छाशक्ति और सकारात्मक विचारों से फिर सक्रिय होकर अपना लक्ष्य पाया जा सकता है।

संकल्प के पीछे विचारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। सकारात्मक, आशावादी, परोपकारी और अच्छे विचार राह से भटकने नहीं देते। जैसा हम बीज बोते हैं वैसी ही फसल हम काटते हैं। हमारा मस्तिष्क हमारे सभी  क्रियाकलापों को नियंत्रित करता है और हमारे विचारों के अनुसार ही मस्तिष्क सक्रिय होकर हमारे संकल्पों को पूरा करने की क्षमता पाता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारे मस्तिष्क के चेतन और अवचेतन दोनों ही भाग महत्वपूर्ण और उपयोगी हैं।  चेतन भाग विभिन्न सूचनाएं, संकेत, क्रियाकलाप आदि में से उपयोगी का चयन कर अवचेतन में भेज देता है। अवचेतन उपयोगी सूचना-संकेतों को स्मृति के रूप में संजोकर रखता है। किसी सूचना या जानकारी की आवश्यकता पड़ने पर ‘इच्छा’ का बटन दबते ही वह उपयुक्त विवरण उपलब्ध करा देता है। अवचेतन हर समय सक्रिय रहता है और विभिन्न समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अपना लक्ष्य तय कर उसको पाने का दृढ़ संकल्प करें, विचार कर सही और सुव्यवस्थित  योजना बनाएं, आवश्यक संसाधन जुटाएं, पूरे उत्साह से जुट जाएं, छोटी-बड़ी असफलता से न घबराएं और न ही अपने कदम रोकें। अपनी कमियों पर विशेष ध्यान देते हुए सदा उन्हें सूझबूझ से दूर करने का प्रयास करते रहें। इस कार्य में भी अपनी संकल्प शक्ति का उपयोग करें।

© टी.सी चन्दर
 सौजन्य: प्रभासाक्षी
 

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