युवाउमंग में पढ़िए
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किस्मत के भरोसे कुछ हासिल नहीं होता परिश्रम और लगन का कोई विकल्प नहीं होता। असफलता को भूल जाना और उससे सबक लेकर आगे बढ़ना ही अच्छा होगा...
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महर्षि दयानन्द को नमन (187वां जन्मोत्सव, 27 फ़रवरी 2011) दयानन्द जी ने गौ हत्या का दृढ़ता से विरोध किया। अपनी पुस्तक ‘गौ करुणानिधि’ में स्...
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कार्टूनिस्ट बनकर कमाइए धन और यश अनेक लोगों के मस्तिष्क में कार्टून बनाने लायक विचार प्रायः आते रहते हैं। चूंकि वे कार्टून ...
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विवेक जाग्रत होने पर मिलता है सुख विवेक के अभाव में हम अपने कर्त्तव्यों का भलीभांति पालन नहीं कर पाते। अपनी इच्छाओं और वासनाओं के वशीभूत होक...
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एक था शनिवार कला मेला • टी.सी. चन्दर सन् 1982 में दिल्ली में आयोजित हुए एशियाई खेलों के चक्कर में सुरक्षा व्यवस्था के चलते प्रशासन को बहान...
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आप अपने रचे/सुने/पढे़ बढ़िया चुटकुले हिन्दी/रोमन/अंग्रेजी में ई-मेल द्वारा भेजें। इससे और अधिक आनन्द चारों ओर फ़ैलेगा। अपना नाम और स्थान अवश...
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गर्मी के मौसम में अपनाएं गुणकारी शर्बत गर्मी के मौसम के दस्तक देने से पहले ही शीतल पेय निर्माता विशेष रूप से बच्चों की कोमल भावनाओं को ध्यान...
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गुलामी स्मृति खेलों ने शेर को बनाया बाघ गुलामी स्मृति खेलों के शुभंकर या मस्कट शेरा या शेर को देखिए, वह शेर है ही नहीं अपितु बाघ या व्याघ्...
रविवार, 23 अक्टूबर 2011
शुभ दिवाली
रविवार, 10 अप्रैल 2011
सावधान
राजधानी में अखबारों में कम शुल्क में कम्प्यूटर शिक्षा का धुंआधार विज्ञापन करने वाले एक उद्योगपति होटल मालिक के इंस्टीट्यूट के अच्छी शिक्षा के दावों में कितनी दम है यह बात भुक्तभोगी छात्र अपने कीमती ८-१० महीने और ‘कम फ़ीस’ बरबाद करने के बाद ही जान पाते हैं। यहां अंग्रेजी बोलचाल भी सिखाई जाती है। हां, फ़ीस के बदले कुछ खास नहीं सिखाया जाता, बस २-३ मोटी किताबें जरूर दे दी जाती हैं। पत्रकारिता, प्रबन्धन, अभिनय, फोटोग्राफी, मल्टीमीडिया व एनीमेशन, फैशन डिजाइनिंग, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर व नेटवर्किंग, मोबाइल मरम्मत, कॉल सेन्टर ट्रेनिंग आदि विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के अनेक प्रशिक्षण केन्द्र या इंस्टीट्यूट आजकल कुकुरमुत्तों की तरह उग आये हैं। ये इंस्टीट्यूट नगर-महानगरों के युवाओं की योग्यता, क्षमता, उत्साह, आकांक्षा आदि का मजाक उड़ाते लगते हैं। यहां छात्रों के भविष्य और कीमती समय की चिन्ता करने की बजाय इंस्टीट्यूटों के मालिक केवल अधिकतम धन लूटने में लगे रहते हैं। नये पाठ्यक्रम, इंटर्नशिप, ट्रेनिंग, शिविर, रोजगार दिलाने, शैक्षिक यात्रा आदि विभिन्न कार्यों के लिए आवश्यकता से अधिक धन वसूलना आम है।
बड़े शहरों में विशेष रूप से ऐसे धंधेबाज इंस्टीट्यूटों की बाढ़ आयी हुई है। यह भी देखने में आया है कि अनेक पाठ्यक्रमों में पूरे साल पढ़ने-पढ़ाने के बाद परीक्षा निकट आते ही बिना कारण बताये छात्रों का प्रवेश पत्र रोक लिया जाता है। कारण, वही मनमानी वसूली। धन मिलने पर ही प्रवेश पत्र दिया जाता है। इस प्रकार की ब्लैक मेलिंग तमाम इंस्टीट्यूटों में चलती है। अच्छीखासी धनराशि वसूलने के बाद ही छात्र को परीक्षा में बैठने दिया जाता है। ऐसे मामलों को लेकर छात्र और अभिभावक काफी परेशान होते हैं। आमतौर पर प्रवेश पत्र रोके जाने का कारण कक्षा में कम उपस्थिति बताने जैसा घिसापिटा बहाना ही बताया जाता है। भारीभररकम जुर्माना देने के बाद सब ठीक हो जाता है।
सम्पन्न अभिभावकों को इसप्रकार जुर्माना चुका पाने में दिक्कत नहीं होती। दिक्कत उन्हें होती है जो मध्य वर्गीय या गरीब होते हैं। जैसे-तैसे वे अपने बच्चों का भविष्य संवारने के सपने को साकार करने को साधन जुटाते हैं। एक मामले में इंजीनियरिंग का छात्र निराश होकर आत्महत्या के लिए भी विवश हो गया। उसने प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा। सौभाग्य से उसकी बात सुनी गयी और उसे प्रशासन के हस्तक्षेप से प्रवेश पत्र मिल गया। पर सभी के साथ ऐसा नहीं हो पाता।
ऐसे छात्रों की संख्या कम नहीं है जो धंधेबाज इन्स्टीट्यूट संचालकों की मीठी बातों और झूठे वायदों-दावों में फंसकर मोटी राशि चुका देते हैं। ऐसे तमाम इन्स्टीट्यूट हैं जिनके पास न उपयुक्त भवन हैं न सही उपकरण या अन्य सुविधाएं। असलियत का पता प्रायः बाद में ही चलता है। इसी तरह लम्बी अवधि के पाठ्यक्रम के साथ-साथ क्रश कोर्स का दावा भी कई बार खोखला साबित होता है। इसके अलावा अवधि पूरी होने पर परीक्षा के बाद प्रमाण पत्र देने के नाम पर भी धन की मांग की जा सकती है। ऐसी ही तमाम समस्याओं से जूझते अनगिनत युवा अपना कैरियर बिगड़ने के डर से चुप रहते हैं और कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।
शिक्षा और प्रशिक्षण की ऐसी दुकानों से सावधान रहना जरूरी हे। शतप्रतिशत रोजगार दिलाने का दम भरने वाले कितने इन्स्टीट्यूट अपना वायदा पूरा करते हैं, ईश्वर ही जाने। अच्छा यही है कि सम्बन्धित इन्स्टीट्यूट में प्रशिक्षण प्राप्त कर रह कुछ छात्रों से बातचीत करने के बाद ही यदि उचित लगे तो वहां प्रवेश लेना चाहिए। इन्स्टीट्यूट संचालक यह भलीभांति जानते हैं कि आज रोजगारपरक शिक्षा या प्रशिक्षण का जमाना है सो वे अपनी शैतानी बुद्धि का उपयोग छात्रों को ठगकर धन ऐंठने में करते हैं। पत्रकारिता और विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के निरन्तर बढ़ते आकर्षण के चलते तमाम धंधेबाज इन्स्टीट्यूटनुमा दुकानें खोलकर बैठ गये हैं। इनके पास प्रशिक्षण के लिए न उपयुक्त शिक्षक-प्रशिक्षक होते हैं और न ही सही साधन। अनेक टीवी चैनलों ने भी अपनी दुकानें खोल ली हैं।
व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को लेकर तमाम मामले प्रकाश में आते हैं और अनेक लोग अदालतों की शरण में भी जाते हैं। यदि छात्र पाठ्यक्रमों से जुड़े सभी कागजात, लिखित अनुबन्ध, नियम, शर्तें, अन्य विवरण आदि प्रस्तुत करते हैं तभी उनका पक्ष मजबूत होता है। धंधेबाज और धोखेबाज इन्स्टीट्यूटों के बारे में शिकायत अवश्य करनी चाहिए। छात्रों को चाहिए कि वे प्रवेश लेने से पहले विश्वविद्यालय या अन्य सम्बन्धित विभाग आदि से मान्यता और सत्यता की जांच कर लेनी चाहिए। इसके अलावा पाठ्यक्रम सम्बन्धी विवरण लिखित में या छपा हुआ लें। मौखिक बातों पर भरोसा कभी न करें। इण्टरनेट की सुविधा के चलते भी धन्धेबाज लोग खूब लाभ उठा रहे हैं। अतः हर वेबसाइट में कही गयी बातों पर बिना सोचे-समझे-परखे आंख मूंदकर विश्वास करना नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है। यदि कोई धन्धेबाजों की धोखेबाजी का शिकार बन जाए तो उसे चुप बैठने की बजाय और लोगों को बताने के साथ-साथ उपभोक्ता फोरम में पूरे विवरण के साथ अपना पक्ष अवश्य रखना चाहिए।
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किस्मत
परिश्रम और लगन का कोई विकल्प नहीं होता। असफलता को भूल जाना और उससे सबक लेकर आगे बढ़ना ही अच्छा होगा। सफल होने तक बढ़ते रहिए। निराश होकर या हारकर मत बैठिए। लक्ष्य आपसे अधिक दूर नहीं है। सफलता आपसे कुछ कदम ही दूर है। आप उसे देख रहे हैं तो उसे अपना बनाने से आपको कोई रोक नहीं सकता। सबसे बड़ी बात यह है कि सफलता और आपके बीच किस्मत नाम का कोई पड़ाव है ही नहीं! आज के वैज्ञानिक युग में सफलता और असफलता को किस्मत का खेल मानने वाले अंधविश्वासी लोगों की संख्या कम नहीं। भाग्य के भरोसे बैठने से कुछ हासिल होने वाला नहीं, यह बात जानते हुए भी अनगिनत लोग लकीर के फकीर बने रहते हैं। सफलता या असफलता उसे ही मिलती है जो उठकर योजना बनाकर चलने की कोशिश करता है। भाग्य या किस्मत के भरोसे बैठे रहकर सफलता की बाट जोहने वालों के कुछ हाथ नहीं आता। सफलता उसे ही मिलती है जो उसे पाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करता है। सफलता के लिए पहले से ही आशंकित व्यक्ति को भला क्या मनचाही सफलता मिल सकती है! हर व्यक्ति की सफलता के पीछे उसके अपने प्रयास ही होते हैं। हां, किसी व्यक्ति को यूं ही सफलता मिल भी गयी हो तो यह मात्र संयोग ही हो सकता है जो कभी-कभार ही सम्भव है।
अच्छी और बुरी किस्मत का भ्रम अनगिनत लोगों को बैठेबिठाये असफल बना चुका है। अनेक युवाओं में प्रायः यह धारणा जड़ जमा लेती है कि किस्मत ने साथ दिया तो सफलता मिल ही जाएगी। चाहे जितना प्रयास कर लो, अगर किस्मत बुलन्द नहीं हुई तो कुछ होने वाला नहीं है। यानी किस्मत की शक्ति अपार है, यह मानने वालों की संख्या भी काफी है। इस प्रकार अपनी असफलताओं और कमियों का दोष बड़ी आसानी से औरों पर या किस्मत के मत्थे मढ़ा जा सकता है।
किस्मत के भरोसे रहने वाले युवा प्रायः औरों के लिए भी घातक हैं। वे अपनी निराशावादी प्रवृत्ति का जाने-अनजाने प्रसार ही करते हैं। लोगों में यह धारणा घर कर जाती है कि किस्मत से ही सफलता मिलेगी या जिन्हें सफलता मिलती है वे ही किस्मत के धनी होते हैं। परीक्षा हो या साक्षात्कार या फिर कोई अन्य कार्य, उसमें सफलता पाने के लिए उपयुक्त कार्ययोजना, लगन, समय का उचित प्रबन्धन, योग्यता, परिश्रम, समुचित प्रयास, दृढ़ निश्चय, संघर्ष, आत्मविश्वास आदि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। आज के प्रतियोगिता के समय में किसी क्षेत्र विशेष में सफलता पा लेना थोड़ा कठिन अवश्य हुआ है पर असंभव नहीं। इस बात को ध्यान में रखते हुए अपना लक्ष्य तय करते समय उससे मिलते-जुलते और अपनी रूचि के विकल्प को भी ध्यान में रखना चाहिए।
इतिहास गवाह है कि आदमी को अपनी आवश्यकता और देखे गये सपनों को पूरा करने के लिए धुन के पक्के बनकर अनथक प्रयास करने के बाद ही सफलता मिली है। वह कभी सफल रहा और कभी असफल भी। असफलताओं ने आदमी को सिखाया भी। तब आदमी किस्मत के भरोसे बैठा रहता तो निश्चय ही आज भी हम उसी सदियों पुराने समय जैसी स्थिति में जी रहे होते। किसी व्यक्ति की सफलता उसके तमाम प्रयासों पर ही निर्भर करती है। यदि पर्याप्त प्रयासों के बाद भी असफलता मिलती है तो उसके पीछे अनेक कारण और कमियां हो सकती हैं। जिन पर ध्यान देकर पुनः प्रयास करके सफलता प्राप्त की जा सकती है।
अच्छा यही है कि काम आरम्भ करने से पहले उस पर भलीभांति विचार करना आवश्यक है। अपने कॅरियर या लक्ष्य के बारे में तय करने से पहले उससे मिलते-जुलते विकल्पों पर भी ध्यान देना चाहिए। निराशा या नकारात्मक सोच से उबरकर आशावादी या सकारात्मक सोच अपनाना बेहद जरूरी है। सफलता के प्रति सन्देह को स्थान नहीं मिलना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि किसी व्यक्ति को भी सफलता चुटकी बजाते नहीं मिल जाती। हर सफलता के पीछे उसे पाने के लिए ईमानदारी से किये गये प्रयास होते हैं। इसके लिए अपने कुछ छोटे-बड़े जरूरी-गैर जरूरी सुख भी त्यागने पड़ते हैं। सफलता एक दिन में नहीं मिल जाती, इसके पीछे होते हैं निरन्तर किये जाने वाले प्रयास। परिश्रम और लगन का कोई विकल्प नहीं होता। असफलता को भूल जाना और उससे सबक लेकर आगे बढ़ना ही अच्छा होगा। सफल होने तक बढ़ते रहिए। निराश होकर या हारकर मत बैठिए। लक्ष्य आपसे अधिक दूर नहीं है। सफलता आपसे कुछ कदम ही दूर है। आप उसे देख रहे हैं तो उसे अपना बनाने से आपको कोई रोक नहीं सकता। सबसे बड़ी बात यह है कि सफलता और आपके बीच किस्मत नाम का कोई पड़ाव है ही नहीं!
• टी.सी. चन्दर
प्रभासाक्षी में प्रकाशित
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शनिवार, 26 फ़रवरी 2011
महर्षि दयानन्द
(187वां जन्मोत्सव, 27 फ़रवरी 2011)
दयानन्द जी ने गौ हत्या का दृढ़ता से विरोध किया। अपनी पुस्तक ‘गौ करुणानिधि’ में स्पष्ट किया है कि मांस भक्षण से मानव मात्र का अपकार होता है, जीवों का पालन करने से प्राणी मात्र का उपकार होता है। स्वामी दयानन्द जी ने नारी शिक्षा आरम्भ करायी।उनको वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। आज यह महर्षि की ही देन है कि देश की महिलाएं अबला से सबला बन गयीं हैं। उन्होंने विधवाओं का पुनर्विवाह कराया। उन्होंने छुआछूत का सदा विरोध किया। ![]() |
सन् 1824 में फ़ाल्गुन कृष्ण पक्ष दशमी को गुजरात में टंकारा ग्राम में श्रीकृष्ण जी के घर एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम मूलशंकर रख गया। बाद में शिक्षा व योग्यता के आधार पर विद्वानों ने इनको दयानन्द सरस्वती नाम दिया। वह प्रकाश का रक्षक एवं प्रचारक था। वह प्राणी मात्र का रक्षक था। वह सांसारिक प्रलोभनों और भोगों से लोहा लेने वाला धुरन्धर योद्धा और विजेता था। दयानन्द वह महामानव थाजिसने अध्यात्म को क्रियात्मक रूप देने में अभूतपूर्व सफ़लता प्राप्त की। उन्होंने कहा था कि योगी बनो, साथ ही कर्मयोगी भी बनो।वेदों की ओर लौटो। आत्मज्ञानी बनो परन्तु मानव भी बनो। वह उन व्यक्तियों में से थे जिन्हें वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों का अध्ययन करके देवताओं की श्रेणी में अग्रणी माना जाता था। वे मानव जाति की प्रेरणा और आदर के पात्र रहे, आज भी हैं और सदा रहेंगे।महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सर्वप्रथम स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने कहा था कि सुराज से स्वराज्य श्रेष्ठ है। स्वतन्त्रता संग्राम में 85% लोग उनके अनुयायी थे। कॉंग्रेस का इतिहास इस बात को प्रमाणित करता है। जितने भी शहीद हुए हैं उनके बारे में पता चलता है कि उनके प्रेरणास्रोत महर्षि दयानन्द ही थे।
अन्याय और काले धन का विरोध कर रहे योगगुरू के रूप में विख्यात बाबा रामदेव महर्षि दयानन्द सरस्वती के ही परम भक्त हैं। दयानन्द जी ने गौ हत्या का दृढ़ता से विरोध किया। अपनी पुस्तक ‘गौ करुणानिधि’ में स्पष्ट किया है कि मांस भक्षण से मानव मात्र का अपकार होता है, जीवों का पालन करने से प्राणी मात्र का उपकार होता है। स्वामी दयानन्द जी ने नारी शिक्षा आरम्भ करायी। उनको वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। आज यह महर्षि की ही देन है कि देश की महिलाएं अबला से सबला बन गयीं हैं। उन्होंने विधवाओं का पुनर्विवाह कराया। उन्होंने छुआछूत का सदा विरोध किया। वे मानते थे कि जन्म से कोई अछूत नहीं होता। स्वामी जी ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और जीव पूजा का समर्थन किया। वे मानते थे कि भारत की गुलामी के मूल में मूर्ति पूजा ही रही है। उन्होंने एक ईश्वर की पूजा पर बल दिया जिसका मुख्य नाम है ‘ओ३म्’ । उन्होंने लोगों को यज्ञ करने की प्रेरणा दी। उन्होंने पाखण्ड और अन्धविश्वास का हमेशा विरोध किया। शास्त्रार्थ किये। विश्वभर के विद्वानों को उनके आगे घुटने टेकने पड़े। वे एक महान् योद्धा थे। उन्होंने वेदों का भाष्य हिन्दी में किया। स्वामी दयानन्द का प्रमुख ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ है जिसमें ईश्वर के 108 नामों की व्याखा व 1576 वेद मन्त्रों का विवरण दिया गया है।उन्होंने सन् 1875 में बम्बई (मुम्बई) में आर्य समाज की स्थापना की। आज आर्य समाज के करोड़ों सदस्य महर्षि के काम को आगे बढ़ा र्हैं। महात्मा गान्धी ने भी लिखा है- महर्षि दयानन्द सरस्वती भारत के आधुनिक ॠषियों व सुधारकों में श्रेष्ठ और अग्रणी थे। उनके कारण ही आज भारत पुन: विश्व गुरू बनने को अग्रसर हो रहा है।
धन्य हैं ऋषि हैं आप, आपने जग जगा दिया। महर्षि दयानन्द सरस्वती के 187वें वर्ष पर हम उन्हें शत्शत् नमन करते हैं।
• सुरेश आर्य
मन्त्री, आर्य समाज, वृन्दावन गार्डन, सहिबाबाद, उ.प्र.
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गुरुवार, 23 दिसंबर 2010
शनिवार कला मेला




गुरुवार, 4 नवंबर 2010
शुभ दीपावली
बुधवार, 1 सितंबर 2010
गुलामी स्मृति खेल





शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
संकल्प
सफल होने वाले व्यक्ति किसी और ग्रह के वासी या हाड़-मांस के अलावा किसी और चीज के बने नहीं होते। वे सिर्फ यह जानते थे कि दृढ़ संकल्प के बल पर ही अपना लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि केवल दृढ़ संकल्प से काम चलने वाला नहीं है। लक्ष्य प्राप्ति के लिए निराशा से मुक्ति पाकर हर अनुकूल-प्रतिकूल स्थिति में अपना उत्साह बनाए रखना, समय का एक पल भी नष्ट न करना, परिश्रम से न घबराना, र्धर्य बनाए रखना, समुचित कार्ययोजना बनाकर अमल में लाना आदि पर ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है।
यदि आप किसी व्यक्ति की सफलता का रहस्य पूछें तो वह यही बताएगा कि उसने ठान लिया था कि वह ऐसा कर के या बन के रहेगा, चाहे कुछ भी हो जाए और इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े। दुनिया की कोई शक्ति उसे विचलित नहीं कर सकती। किसी व्यक्ति को हो सकता है सफलता आसानी से या संयोगवश मिल गयी हो। ऐसा अपवाद स्वरूप ही हो सकता है। इस प्रकार के किसी संयोग का इन्तजार में भाग्य के भरोसे बैठ सफलता पाने की सोचना मूर्खता के सिवा कुछ और नहीं। हां, उपयुक्त अवसर को कभी छोड़ना नहीं चाहिए। इसकी पहचान अपने विवेक और दूरदृष्टि से की जा सकती है।
इच्छाशक्ति संकल्प जैसे बहुमूल्य सिक्के का दूसरा पहलू है। यह हमारे संकल्प को दृढ़ता प्रदान करती है। इसलिए अपनी इच्छाशक्ति को कभी कमजोर नहीं होने देना चाहिए। इससे हमें निराशा जैसी नकारात्मक स्थिति से भी छुटकारा मिलता है। ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि और अनेकानेक संसाधनों के अलावा संकल्प करने की क्षमता भी प्रदान की है। संकल्प कर लेने के बाद अपने पिछले कार्यों, व्यवहार, अभ्यास, आदतों आदि पर स्वयं अपने आलोचक बनकर दृष्टि डालनी चाहिए। संकल्प कर्म के बिना व्यर्थ है। गलत ढंग से और बिना कार्य योजना के कर्म करते जाना भी व्यर्थ है। स्वयं अपने प्रति, अपने संकल्प के प्रति और अपने प्रयासों के प्रति ईमानदार रहना बेहद जरूरी है।
शिक्षा और करियर ही नहीं व्यवहार व आदतों के मामले में भी संकल्प महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संकल्प तथा कर्म से मिली सफलता किसी पैमाने से नापना व्यर्थ है। कोई सफलता छोटी या बड़ी नहीं। सफलता सफलता होती है और उसका अपना महत्व होता है। आवश्यक नहीं कि आप हर बार अपना संकल्प पूरा कर सफल होते चले जाएं। आज जो लोग हमें सफलता के शिखर पर बैठे दिखायी देते हैं वे ही जानते हैं कि वे कितनी बार असफल हुए हैं। पर असफताएं उन्हें विचलित नहीं कर सकीं। कुछ लोग, विशेष रूप से अनेक युवा थोड़ा असफल होने पर हिम्मत हार जाते हैं। ऐसे अनेक लोग नशे की शरण में चले जाते है और फिर अपनी कहानी औरों को सुनाते फिरते हैं। कोई उन्हें गम्भीरता से नहीं सुनता। अक्सर लोग मजाक ही उड़ाते हैं। नतीजा यह कि असफता से घबराने की जरूरत नहीं क्यों कि किसी व्यक्ति की बड़ी सफलता के पीछे अनेक छोटी-बड़ी असफलताएं हो सकती हैं जिनके बारे में प्रायः सभी लोग नहीं जान पाते हैं। असफल होने पर भी संकल्प, इच्छाशक्ति और सकारात्मक विचारों से फिर सक्रिय होकर अपना लक्ष्य पाया जा सकता है।
संकल्प के पीछे विचारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। सकारात्मक, आशावादी, परोपकारी और अच्छे विचार राह से भटकने नहीं देते। जैसा हम बीज बोते हैं वैसी ही फसल हम काटते हैं। हमारा मस्तिष्क हमारे सभी क्रियाकलापों को नियंत्रित करता है और हमारे विचारों के अनुसार ही मस्तिष्क सक्रिय होकर हमारे संकल्पों को पूरा करने की क्षमता पाता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारे मस्तिष्क के चेतन और अवचेतन दोनों ही भाग महत्वपूर्ण और उपयोगी हैं। चेतन भाग विभिन्न सूचनाएं, संकेत, क्रियाकलाप आदि में से उपयोगी का चयन कर अवचेतन में भेज देता है। अवचेतन उपयोगी सूचना-संकेतों को स्मृति के रूप में संजोकर रखता है। किसी सूचना या जानकारी की आवश्यकता पड़ने पर ‘इच्छा’ का बटन दबते ही वह उपयुक्त विवरण उपलब्ध करा देता है। अवचेतन हर समय सक्रिय रहता है और विभिन्न समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अपना लक्ष्य तय कर उसको पाने का दृढ़ संकल्प करें, विचार कर सही और सुव्यवस्थित योजना बनाएं, आवश्यक संसाधन जुटाएं, पूरे उत्साह से जुट जाएं, छोटी-बड़ी असफलता से न घबराएं और न ही अपने कदम रोकें। अपनी कमियों पर विशेष ध्यान देते हुए सदा उन्हें सूझबूझ से दूर करने का प्रयास करते रहें। इस कार्य में भी अपनी संकल्प शक्ति का उपयोग करें।
© टी.सी चन्दर
सौजन्य: प्रभासाक्षी
शनिवार, 29 मई 2010
जनगणना
तर्क यह दिया जाता है कि अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा| उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हॉं, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं देना है, उन सवर्णों से उनकी जात न पूछी जाए| लेकिन इस देश में मेरे जैसे भी कई लोग हैं, जो कहते हैं कि मेरी जात सिर्फ हिंदुस्तानी है और जो जन्म के आधार पर दिए जानेवाले हर आरक्षण के घोर विरोधी हैं| उनकी मान्यता है कि जन्म यानी जाति के आधार पर दिया जानेवाला आरक्षण न केवल राष्ट्र-विरोधी है बल्कि जिन्हें वह दिया जाता है, उन व्यक्तियों और जातियों के लिए भी विनाशकारी है| इसीलिए जन-गणना में से जाति को बिल्कुल उड़ा दिया जाना चाहिए| यदि 2010 की इस जनगणना में जाति को जोड़ा जाएगा तो वह बिल्कुल निरर्थक होगा क्योंकि आरक्षण की सीमा उच्चतम न्यायालय ने पहले ही बांध रखी है| 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी हालत में नहीं दिया जा सकता| यदि आरक्षितों की संख्या 1931 के मुकाबले अब बढ़ गई हो तो भी उनको कोई फायदा नहीं मिलेगा और कुल जनसंख्या के अनुपात में अगर वह घट गई हो तो हमारे देश के नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं कि आरक्षण के प्रतिशत को वे घटवा सकें| इसलिए प्रश्न उठता है कि जनगणना में जाति को घसीट कर लाने से किसको क्या फायदा होनेवाला है ?जाति पर आधारित आरक्षण ने गरीबों और वंचितों का सबसे अधिक नुकसान किया है| आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को आरक्षण से क्या मिलता है ? सिर्फ नौकरियाँ ! 5-7 हजार लोगों के मुंह में सरकारी नौकरियों की चूसनी (लॉलीपॉप) रखकर देश के 60 करोड़ से ज्यादा वंचितों के मुंह पर ताले जड़ दिए गए हैं| उनके विशेष अवसर, विशेष सुविधा और विशेष सहायता के द्वार बंद कर दिए गए हैं| उन्हें खोलना बहुत जरूरी है| क्या 5 हजार रेवडि़याँ बांट देने से 60-70 करोड़ वंचितों के पेट भर जाएंगे? आरक्षण न सिर्फ उनके पेट पर लात मारता है बल्कि उनके सम्मान को भी चोट पहुंचाता है| जो अपनी योग्यता से भी चुनकर आते हैं, उनके बारे में भी मान लिया जाता है कि वे आरक्षण (कोटे) के चोर दरवाज़े से घुस आए हैं| हमारे नेताओं ने जाति को आरक्षण का सबसे सरल आधार मान लिया था लेकिन अब वह सबसे जटिल आधार बन गया है| अभी आरक्षण का आधार बहुत संकरा है, उसे बहुत चौड़ा करना जरूरी है| जाति का आधार सिर्फ हिन्दुओं पर लागू होता है| इसके कारण हमारे देश के मुसलमानों और ईसाइयों में जो वंचित लोग हैं, उनको भी बड़ा नुकसान हुआ है| जिसे जरूरत थी, उसे रोटी नहीं मिली और जिसके पास जात थी, वह मलाई ले उड़ा|
जन-गणना में जाति का समावेश किसने किया, कब से किया, क्यों किया, क्या यह हमें पता है ? यह अंग्रेज ने किया, 1871 में किया और इसलिए किया कि हिंदुस्तान को लगातार तोड़े रखा जा सके| 1857 की क्रांति ने भारत में जो राष्ट्रवादी एकता पैदा की थी, उसकी काट का यह सर्वश्रेष्ठ उपाय था कि भारत के लोगों को जातियों, मजहबों और भाषाओं में बांट दो| मज़हबों और भाषाओं की बात कभी और करेंगे, फिलहाल जाति की बात लें| अंग्रेज के आने के पहले भारत में जाति का कितना महत्व था ? क्या जाति का निर्णय जन्म से होता था ? यदि ऐसा होता तो दो सौ साल पहले तक के नामों में कोई जातिसूचक उपनाम या 'सरनेम' क्यों नहीं मिलते ? राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, महेश, बुद्घ, महावीर किसी के भी नाम के बाद शर्मा, वर्मा, सिंह या गुप्ता क्यों नहीं लगता ? कालिदास, कौटिल्य, बाणभट्रट, भवभूति और सूर, तुलसी, केशव, कबीर, बिहारी, भूषण आदि सिर्फ अपना नाम क्यों लिखते रहे ? इनके जातिगत उपनामों का क्या हुआ ? वर्णाश्रम धर्म का भ्रष्ट होना कुछ सदियों पहले शुरू जरूर हो गया था लेकिन उसमें जातियों की सामूहिक राजनीतिक चेतना का ज़हर अंग्रेजों ने ही घोला| अंग्रेजों के इस ज़हर को हम अब भी क्यों पीते रहना चाहते हैं ? मज़हब के ज़हर ने 1947 में देश तोड़ा, भाषाओं का जहर 1964-65 में कंठ तक आ पहुंचा था और अब जातियों का ज़हर 21 वीं सदी के भारत को नष्ट करके रहेगा| जन-गणना में जाति की गिनती इस दिशा में बढ़नेवाला पहला कदम है| इसीलिए हमारे संविधान निर्माताओं और आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति को बिल्कुल हटा दिया था|1931 में आखिर अंग्रेज 'सेंसस कमिश्नर' जे.एच. हट्टन ने जनगणना में जाति को घसीटने का विरोध क्यों किया था ? वे कोरे अफसर नहीं थे| वे प्रसिद्घ नृतत्वशास्त्री भी थे| उन्होंने बताया कि हर प्रांत में हजारों-लाखों लोग अपनी फर्जी जातियॉं लिखवा देते हैं ताकि उनकी जातीय हैसियत ऊँची हो जाए| कुछ जातियों के बारे में ऐसा भी है कि एक प्रांत में वे वैश्य है तो दूसरे प्रांत में शूद्र| एक प्रांत में वे स्पृश्य हैं तो दूसरे प्रांत में अस्पृश्य ! हर जाति में दर्जनों से लेकर सैकड़ों उप-जातियॉं हैं और उनमें भी ऊँच-नीच का झमेला है| 58 प्रतिशत जातियॉ तो ऐसी हैं, जिनमें 1000 से ज्यादा लोग ही नहीं हैं| उन्हें ब्राह्रमण कहें कि शूद्र, अगड़ा कहें कि पिछड़ा, स्पृश्य कहें कि अस्पृश्य - कुछ पता नहीं| आज यह स्थिति पहले से भी बदतर हो गई है, क्योंकि अब जाति के नाम पर नौकरियॉं, संसदीय सीटें, मंत्री और मुख्यमंत्री पद, नेतागीरी और सामाजिक वर्चस्व आदि आसानी से हथियाएं जा सकते हैं| लालच बुरी बलाय ! लोग लालच में फंसकर अपनी जात बदलने में भी संकोच नहीं करते| सिर्फ गूजर ही नहीं हैं, जो 'अति पिछड़े' से 'अनुसूचित' बनने के लिए लार टपका रहे हैं, उनके पहले 1921 और 1931 की जन-गणना में अनेक राजपूतों ने खुद को ब्राह्रमण, वैश्यों ने राजपूत और कुछ शूद्रों ने अपने आप को वैश्य और ब्राह्रमण लिखवा दिया| जिन स्त्री और पुरूषों ने अंतरजातीय विवाह किया है, उनकी संतानें अपनी जात क्या लिखेगी ? जनगणना करने वाले कर्मचारियों के पास किसी की भी जात की जाँच-परख करने का कोई पैमाना नहीं है| हर व्यक्ति अपनी जात जो भी लिखाएगा, उसे वही लिखनी पड़ेगी| वह कानूनी प्रमाण भी बनेगी| कोई आश्चर्य नहीं कि जब आरक्षणवाले आज़ाद भारत में कुछ ब्राह्रमण अपने आप को दलित लिखवाना पसंद करें बिल्कुल वैसे ही जैसे कि जिन दलितों ने अपने आप को बौद्घ लिखवाया था, आरक्षण से वंचित हो जाने के डर से उन्होंने अपने आप को दुबारा दलित लिखवा दिया| यह बीमारी अब मुसलमानों और ईसाइयों में भी फैल सकती है| आरक्षण के लालच में फंसकर वे इस्लाम और ईसाइयत के सिद्घांतों की धज्जियां उड़ाने पर उतारू हो सकते हैं | जाति की शराब राष्ट्र और मज़हब से भी ज्यादा नशीली सिद्घ हो सकती है|
दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, ग्रामीणों, गरीबों को आगे बढ़ाने का अब एक ही तरीका है| सिर्फ शिक्षा में आरक्षण हो, पहली से 10 वीं कक्षा तक| आरक्षण का आधार सिर्फ आर्थिक हो| जन्म नहीं, कर्म ! आरक्षण याने सिर्फ शिक्षा ही नहीं, भोजन, वस्त्र्, आवास और चिकित्सा भी मुफ्त हो| प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से सक्षम बने और जीवन में जो कुछ भी प्राप्त करे, वह अपने दम-खम से प्राप्त करे| यह विशेष अवसर के सिद्घांत का सर्वश्रेष्ठ अमल है| इस व्यवस्था में जिसको जरूरत है, वह छूटेगा नहीं और जिसको जरूरत नहीं है, वह घुस नहीं पाएगा, उसकी जात चाहे जो हो| जात पर आधरित नौकरियों का आरक्षण चाहे तो अभी कुछ साल और चला लें लेकिन उसे समाप्त तो करना ही है| जात घटेगी तो देश बढ़ेगा| वोट-बैंक की राजनीति को बेअसर करने का एक महत्वपूर्ण तरीका यह भी है कि देश में मतदान को अनिवार्य बना दिया जाए| जन-गणना से जाति को हटाना काफी नहीं है, जातिसूचक नामों और उपनामों को हटाना भी जरूरी है| जातिसूचक नाम लिखनेवालों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध होना चाहिए| उन्हें सरकारी पदों और नौकरियों से वंचित किया जाना चाहिए| यदि मजबूर सरकार के गणक लोगों से उनकी जाति पूछें तो वे या तो मौन रहें या लिखवाएं– ‘मैं हिंदुस्तानी हूं|’ हिंदुस्तानी के अलावा मेरी कोई जात नहीं है|
• डॉ. वेदप्रताप वैदिक
(लेखक 'जनगणना से जात हटाओ' आंदोलन के सूत्रधार हैं|)
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कार्यालय: 13 बाराखंभा रोड, नई दिल्ली-110001
प्रस्तुति: टी.सी. चन्दर
सोमवार, 17 मई 2010
स्वयंसेवा
अनाधिकार चेष्टा करने वाले व्यक्ति को प्रायः काफी नुकसान उठाने के बाद ही अक्ल आती है। अनाधिकार चेष्टा की अपनी गलती पर तब पछतावा होता है। निश्चय ही ऐसे प्रयास अन्ततः महंगे साबित होते हैं। यदि आपने अभी तक कोई छोटा-बड़ा नुकसान नहीं उठाया है और अपना रवैया बदल डालिए। किसी बड़े नुकसान के होने का इन्तजार मत कीजिए। आवश्यकता पड़ने पर हमेशा जानकार और योग्य व्यक्ति या सम्बन्धित कम्पनी की सेवाएं लीजिए। इस मन्त्र को अपनाने में ही भलाई है।
मेरे एक मित्र हैं। उनका जब कोई उपकरण, मशीन या अन्य चीज चलते-चलते रुक जाती है या काम करना बन्द कर देती है तो वे उसे लेकर बैठ जाते हैं। पेचकस-प्लास मिला तो ठीक वरना वे चाकू और रसोई में काम आने वाली सड़सी से भी भलीभांति कार्यकौशल दिखा देते हैं। उनके ऐसे प्रयासों का अन्त कैसा होता होगा, आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं। संयोग से कभी तुक्का लग गया तो उन्हें सफलता मिल जाती है और अपनी विशेषज्ञता के गर्व से उनका सीना फूल जाता है। वैसे ऐसा बहुत ही कम होता है। प्रायः यह विशेषज्ञता उन्हें अपनी जेब पर भारी ही पड़ती है। स्वयं को विभिन्न कामों में माहिर समझने के इस फेर में बहुमूल्य समय और धन बरबाद करने के साथ-साथ असुविधा झेलने वाले लोगों की कमी नहीं है।किसी दुर्घटना के बाद, किसी के बीमार होने पर, कोई मशीन या वस्तु खराब होने पर या ऐसी ही अन्य विभिन्न स्थितियों में अनेकानेक परामर्शदाता और विशेषज्ञ अपनी राय देने लगते हैं या मरम्मत-उपचार के प्रयास करने लगते हैं। यह अनाधिकार चेष्टा ही है। इससे प्रायः अस्थायी या स्थायी रूप से नुकसान ही हासिल होता है। हर फ़न में माहिर होना सम्भव नहीं होता। किसी दुर्घटना में घायल व्यक्ति को बैठने मत दीजिए और उसे सावधानी से किसी वाहन में लिटाकर यथाशीघ्र अस्पताल पहुचाने का प्रबन्ध कीजिए।
किसी बीमार को देखने जाएं तो उसे अपनी चिकित्सकीय सलाह मत दीजिए, किसी परहेज, मालिश, किसी टॉनिक आदि के सेवन के लिए जोर मत दीजिए। हो सकता है कोई परेशान व्यक्ति या उसका परिजन आपकी बात मानकर व्यवहार में लाए और रोगी को किसी प्रकार का नुकसान उठाना पड़ जाए। आप सिर्फ उसका हालचाल पूछिए, उसकी हिम्मत बढ़ाइए और यदि उसे किसी प्रकार की मदद की जरूरत है तो यथासम्भव मदद कीजिए पर उसके भूलकर भी उसके डॉक्टर मत बनिए।
जब कोई उपकरण, मशीन या वस्तु खराब हो जाए तो स्वयं मिस्त्री या इंजीनियर मत बनिए। उसे उपयुक्त व्यक्ति के पास ले जाइए। सम्भव है उसमें कोई मामूली खराबी आ गयी हो और यह भी सम्भव है कि आपके प्रयास करने से वह बड़ी खराबी में बदल जाए जिसमें अधिक समय और पैसे लगें। सच मानिए, अनेक बार ऐसा ही होता है। हर बार तुक्का काम नहीं करता। जिस कार्य के बारे में आप नहीं जानते उसमें कुशलता हासिल करने के लिए उस कार्य को पहले सीखना, अभ्यास करना और अनुभव प्राप्त करना जरूरी होता है। जरा सोचिए, आप कितने कार्य सीखिंगे! अच्छा यही है कि आप सिर्फ अपना काम कीजिए और दूसरों को अपना काम करने दीजिए। अनाधिकार चष्टा मत कीजिए।
अनाधिकार चेष्टा करने वाले व्यक्ति को प्रायः काफी नुकसान उठाने के बाद ही अक्ल आती है। अनाधिकार चेष्टा की अपनी गलती पर तब पछतावा होता है। निश्चय ही ऐसे प्रयास अन्ततः महंगे साबित होते हैं। यदि आपने अभी तक कोई छोटा-बड़ा नुकसान नहीं उठाया है और अपना रवैया बदल डालिए। किसी बड़े नुकसान के होने का इन्तजार मत कीजिए। आवश्यकता पड़ने पर हमेशा जानकार और योग्य व्यक्ति या सम्बन्धित कम्पनी की सेवाएं लीजिए। इस मन्त्र को अपनाने में ही भलाई है।
एक बात और, जिस बात के बारे में आप स्वयं आश्वस्त या निश्चिन्त नहीं हैं, उसे आप मत कहिए। अपनी बात की औरों पर होने वाली प्रतिक्रिया का अनुमान लगाइए, बुद्धिमानी से काम लीजिए। अनेक परिस्थितयों में आपका मौन आपका और औरों का भला ही करेगा। यह बात सच है कि लोगों के साथ व्यवहार करना एक कठिन काम है। इस काम को बड़ी आसानी से आसान बनाया जा सकता है। चतुराई और सहनशीलता व्यवहार में लाएं। पर निन्दा और अप्रिय बातें न करें। अपने हृदय को निर्मल बनाएं, लोगों के अच्छे व्यवहार और गुणों की प्रशंसा करें, विनम्र बनें और भूलकर भी अनाधिकार चेष्टा न करें। निश्चिन्त रहिए, आप कभी घाटे में नहीं रहेंगे।
• टी.सी. चन्दर /प्रभासाक्षी
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शनिवार, 9 मई 2009
बनें कार्टूनिस्ट

अनेक लोगों के मस्तिष्क में कार्टून बनाने लायक विचार प्रायः आते रहते हैं। चूंकि वे कार्टून बनाना नहीं जानते सो रोजाना अनगिनत कार्टूनी विचारों की मृत्यु होती रहती है। आपकी रुचि कार्टून बनाने में है और आप रेखांकन करते रहते हैं या करना चाहते हैं तो आपकी राह मुश्किल नहीं है। आप कार्टून कला में निपुण होकर इसे शौक, पार्ट टाइम या फ़ुल टाइम व्यवसाय यानी करियर के रूप में अपना सकते हैं।
कला ही जीवन है-यह निश्चय ही आपने पढ़ा-सुना होगा। भूगोल, इतिहास, रसायन विज्ञान, गणित या किसी अन्य विषय के बारे में ऐसा नहीं कहा जाता। कला की महत्ता को काफी समय पहले ही पहचान कर इसके बारे में कहा गया है। व्यंग्यचित्र यानी कार्टून कला भी कला की एक महत्वपूर्ण विधा है। कार्टून कला के उपयोग के क्षेत्र को आज जैसा विस्तार मिला है वैसा पहले कभी नहीं मिला। लगभग हर उम्र के लोगों में कार्टून बेहद लाकप्रिय है। समार पत्र, पत्रिकाओं, चित्रकथाओं के अलावा टीवी, इण्टरनेट, एनीमेशन, प्रचार सामग्री, पेकेजिंग, पहचान चिन्ह आदि तमाम क्षेत्रों में कार्टून कला का ही बोलबाला है। विभिन्न कार्टून पात्र जनमानस में अपनी अच्छी पैठ बना चुके है।
अनेक लोगों के मस्तिष्क में कार्टून बनाने लायक विचार प्रायः आते रहते हैं। चूंकि वे कार्टून बनाना नहीं जानते सो रोजाना अनगिनत कार्टूनी विचारों की मृत्यु होती रहती है। आपकी रुचि कार्टून बनाने में है और आप रेखांकन करते रहते हैं या करना चाहते हैं तो आपकी राह मुश्किल नहीं है। आप कार्टून कला में निपुण होकर इसे शौक, पार्ट टाइम या फ़ुल टाइम व्यवसाय यानी करियर के रूप में अपना सकते हैं। अनेक कार्टूनिस्ट ऐसे है जो भिन्न क्षेत्र में अच्छे पदों पर कार्य या व्यवसाय करते हुए भी कार्टून कला को अपनाए हुए हैं। अनेक लोग कार्टूनिस्ट के रूप में फुल टाइम या पार्ट टाइम नौकरी या फ़्रीलांस काम कर रहे हैं। एक कार्टूनिस्ट का कार्य उसे इष्ट-मित्रों के साथ-साथ समाज में भी पर्याप्त प्रतिष्ठा दिलाता है।
अधिकांश जानेमाने कार्टूनिस्ट बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के निपुण हुए हैं। वैसे भी हमारे यहां कार्टून कला सिखाए जाने का समुचित और विशेष प्रबन्ध नहीं है। यही नहीं, हिन्दी में अच्छी पुस्तकों का भी अभाव है। कार्टून केद्रित पत्रिकाएं भी बहुत कम या कहें न के बराबर हैं। अच्छा कार्टूनिस्ट बनने के लिए वास्तविक चित्रण का ज्ञान होना और निरन्तर अभ्यास करना उपयोगी सिद्ध होता है। इसके लिए लिए किसी योग्य प्रशिक्षक या कला ज्ञाता से प्रशिक्षण लिया जा सकता है। किसी विद्यालय या कला विद्यालय में प्रवेश लेकर कला की विधिवत शिक्षा ली जा सकती है। कला विद्यालयों में प्रायः पेण्टिंग, शिल्प (स्कल्पचर) और अनुप्रयुक्त कला (एप्लाइड आर्ट) का 4 वर्षीय पाठ्यक्रम होता है। हर हाल में नियमित अभ्यास आपको ही करना होगा। चित्रकला और शरीर रचना (एनोटॉमी) सम्बन्धी अच्छी पुस्तकों को देखना-पढ़ना और अभ्यास करना चाहिए।
अपने अवलोकन, फोटो, चित्र आदि की सहायता से रेखांकन करना चाहिए। सादा सफेद कागज पर 2बी या 4बी नम्बर की मुलायम काली पेंसिल हलके हाथ चलाते हुए निर्देशानुसार खूब अभ्यास करना चाहिए। बाद में छपे हुए कार्टूनों को देखकर पेंसिल से बनाएं और काली स्याही होल्डर, पेन, क्रोक्विल, बो पेन, ब्रश, या कलम आदि में से चुनें और उससे कार्टून बनाएं। छपने के लिए कार्टून भेजने से पहले कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है ताकि आपके सभी कार्टून खेद सहित वापस न लौटें।
किसी कार्टून का आधार उसका विचार होता है। कार्टून एक या अधिक सम्वाद या किसी प्रसंग या घटना पर आधारित बिना सम्वाद वाला हो सकता है। हर कार्टूनी विचार को पॉकेट डायरी में तारीख के साथ लिखकर रख लें। अपने पास सदा एक पॉकेट डायरी और पेन या पेंसिल अवश्य रखें।याद रखिए, एक बार गया विचार फिर लौटकर नहीं आएगा। आवश्यकता और मांग के अनुरूप भी विषय या सामग्री आधारित कार्टून या कार्टून चित्र (इलस्ट्रेशन) बनाए जाते हैं।
कुछ लोग कार्टून को आड़ी-तिरछी रेखाओं की प्रस्तुति मानते हैं पर वास्तव में ऐसा नहीं है। एक अच्छे कार्टून में किसी अच्छे चित्र की भांति ही कला के नियमों का ध्यान रख जाता है। कार्टून में वस्तु, पात्र, दृश्य या पृष्ठभूमि या वातावरण आदि का वास्तकि चित्रण की भांति ध्यान रख जाता है। इसके अलावा पात्र या वस्तुओं के वास्तविक जैसे काल्पनिक रूप, दृश्य या वातावरण, सही अनुपात, परिप्रेक्ष्य, आकार, संवाद, हावभाव, संतुलन आदि का पर्याप्त ध्यान रख जाता है। इसी प्रकार कार्टून में रंग भरते समय भी अनेक बातों का ध्यान रखा जाता है। इस प्रकार एक अच्छे विचार की कार्टून के रूप में सही प्रस्तुति की जा सकती है।
कार्टून कला में कम्प्यूटर का उपयोग भी खूब हो रहा है। एक कार्टूनिस्ट के लिए कम्प्यूटर और सम्बन्धित सॉफ़्ट्वेयरों की जानकारी एक अतिरिक्त योग्यता होती है। हाथ से बनाए कार्टून को स्कैन कर या कम्प्यूटर पर ही कार्टून बनाकर उसमें उचित रंग भरना और विशेष प्रभाव दर्शाना भी एक कला है। सभी कार्टून डाक द्वारा या कम्प्यूटर और इण्टरनेट का उपयोग करते हुए ई-मेल द्वारा भेजे जा सकते हैं। ई-मेल सेवा त्वरित और मुफ्त उपलब्ध है।
पत्र-पत्रिकाओं के अलावा एलैक्ट्रॉनिक मीडिया में एक कार्टूनिस्ट को निर्धारित वेतनमान के अनुसार या मोलभाव के बाद अच्छा वेतन मिलता है। अनुबन्ध पर भी कार्टूनिस्ट रखे जाते हैं और पार्टटाइम भी। स्वतन्त्र रूप से कार्टून बनाने पर निर्धारित दर या तय राशि के अनुसार भुगतान किया जाता है। प्रायः कार्टून छपने के 1 से 3 माह के भीतर या कहीं-कहीं स्वीकृंति के साथ ही क्रॉस्ड चैक द्वारा भुगतान किया जाता है। भगतान का तरीका प्रकाशन या प्रतिष्ठान के नियमों के अनुसार ही होता है। अपने कार्य की फ़ोटोकॉपी तारीख सहित अपने पास अवश्य रखनी चाहिए।
दैनिक समाचार पत्र के सम्पादकीय कार्टूनिस्ट के लिए कल्पनाशीलता, किसी सामयिक या समसामयिक घटना या प्रसंग पर त्वरित व्यंग्यात्मक टिप्पणी रेखाओं और आवश्यकतानुसार रंगों के उपयोग द्वारा व्यक्त करना, राजनीति और राजनीतिज्ञों के बारे में पर्याप्त जानकारी रखना, खबरों से नियमित रूप से जुड़े रहना, खूब पढ़ना आदि बातों का होना आवश्यक है।
वर्गीकरण के अनुसार कार्टूनों के प्रमुख प्रकार-
सम्पादकीय कार्टून- समाचार पत्रों के मुख पृष्ठ पर छपने वाले सामयिक-समसामयिक विषयों पर छपने वाले पॉकेट कार्टून और 3, 4 या अधिक कॉलमों में छपने वाले बड़े कार्टून राजनीतिक या सम्पादकीय कार्टून कहलाते हैं।
सामान्य कार्टून और कार्टून स्ट्रिप- समाचार पत्र और विभिन्न पत्रिकाओं में छपने वाले गैर राजनीतिक यानी घरेलू, सामाजिक, व्यावसायिक आदि प्रकार के कार्टून और कार्टून स्ट्रिप सामान्य कार्टून और कार्टून स्ट्रिप होते हैं। ये 1, 2, 3 या अधिक फ्रेम वाले कार्टून होते हैं। इनमें सम्वाद और चित्रों या केवल चित्रों के माध्यम से कार्टूनिस्ट अपनी बात कहता है। एक से अधिक फ्रेम वाले कार्टूनों में पात्रों और वस्तुओं को अलग-अलग कोण व आकार में प्रस्तुत करने में उनकी एकरूपता का ध्यान रखा जाता है।
कॉमिक या चित्रकथा- प्रायः 28 या अधिक पृष्ठों में छपने वाली चित्रकथा में पूरी कहानी चित्र और सम्वादों के द्वारा प्रस्तुत की जाती है। प्राय: चित्रकथा की कहानी और पटकथा लेखक अलग-अलग व्यक्ति होते हैं। यदि कार्टूनिस्ट सक्षम है तो ये काम भी वह स्वयं कर लेता है। कॉमिक प्रायः रंगीन होते हैं। मूल चित्र छपे चित्रों की अपेक्षा कम से कम दो गुने बड़े आकार में बनाए जाते हैं।
इलस्ट्रेशन- किसी लेख कहानी या अन्य सामग्री को सचित्र और प्रभावशाली बनाने के लिए कार्टूनिस्ट से उपयुक्त चित्र बनवाया जाता है।
कैरीकेचर- यह व्यक्तिचित्र होता है जिसमें अक्सर उस व्यक्ति के गुण, कार्य या व्यवसाय, शौक आदि को भी व्यंग्यात्मक रूप में शामिल किया जाता है। कैरीकेचर बनाने के लिए सम्बन्धित व्यक्ति के एकाधिक फोटो की सहायता लेकर या उसे सामने बैठाकर इस प्रकार उसका व्यंग्यचित्र बनाया जाता है कि वह व्यक्ति आसानी से पहचाना जा सकता है। कल्पनाशक्ति का उपयोग करते हुए उस व्यक्ति के चेहरे की बनावट को इस प्रकार तोड़मरोड़कर बदला जाता है कि वह वास्तविक चित्र नहीं रहता पर उसकी पहचान कायम रहती है। प्रायः राजनेताओं, बड़े व्यवसाइयों और प्रसिद्ध व्यक्तियों के कैरीकेचर बनवाकर छापे जाते हैं।
एनीमेशन फिल्म- अधिकांश बच्चे ही नहीं बड़े भी एनीमेशन और कार्टून फिल्मों के दीवाने होते हैं। अनेक कार्टून पात्र उनके मन-मस्तिष्क पर राज करते हैं। 24 घण्टे चलने वाले अनेक कार्टून टीवी चैनल इसका प्रमाण हैं। विज्ञापन फिल्मों में भी कार्टून पात्रों का खूब उपयोग हो रहा है। एक कार्टून फिल्म बनाने में अनेक लोगों की भूमिका होती है। इसके लिए काफी सूझबूझ, निपुणता और पश्रिम की आवश्यकता होती है। श्रम सस्ता होने के कारण हमारे यहां एनीमेशन का काम इतना बढ़ गया है कि आज के समय को एनीमेशन युग कहें तो गलत नहीं होगा। अनेक जानेमाने भारतीय फिल्म कलाकार एनमेशन फिल्में बनाने में जुट गये हैं। जगह-जगह एनीमेशन इंस्टीट्यूट खुल गये हैं।
वेबसाइट- विभिन्न वेबसाइटें और समाचार पोर्टल भी यिमित रूप से कार्टून छापते हैं या अन्य प्रकार से कार्टूनों का उपयोग करते हैं। एक कार्टूनिस्ट अपनी खुद की वेबसाइट बनाकर अपने कार्य के नमूने, पारिश्रमिक की दरें और अपना पूरा परिचय दशाकर देश-विदेश के लिए कार्य करके नाम और दाम दोनों कमा सकता है। अपनी वेबसाइट को दैनिक, साप्ताहिक या अन्य प्रकार से अपडेट करते हुए असंख्य लोगों को अपने बारे में बताया जा सकता है। इसके बारे में किसी जानकार व्यक्ति से पहले पूरी जानकारी लेना ठीक रहता है।
सिण्डीकेटेड कार्टून सेवा- अपने बनाए कार्टूनों को देश-विदेश के अनेक पत्र-पत्रिकाओं को भेजने के लिए एजेंसी आरम्भ की जा सकती है। इसके माध्यम से अन्य कार्टूनिस्टों के कार्टन भी कमीशन के आधर पर भेजे जा सकते हैं। एक सिण्डीकेटेड कार्टून कई पत्र-पत्रिकाओं को बहुत कम दर पर भेजा जाता है। अतः छोटे-बड़े, हिन्दी-अंग्रेजी, राष्ट्रीय-क्षेत्रीय-सभी प्रकार के पत्र-पत्रिकाएं ऐसे कार्टून मंगाकर छाप सकते हैं। प्रायः हमारे यहां विदेशी कार्टून और कार्टून स्ट्रिप खूब छपती हैं।
रोजगार के अवसर
पत्र-पत्रिका व पुस्तक प्रकाशन गृह, विज्ञापन एजेंसियां, वेबसाइटें, एनीमेशन कम्पनियां, एनीमेशन इंस्टीट्यूट, टीवी चैनल, ग्रीटिंग कार्ड व कलेण्डर निर्माता आदि समय-समय पर विज्ञापन देकर कार्टूनिस्टों को बुलाते हैं। कल्पनाशील, समय के पाबन्द, कुशल, अनुभवी, व्यवहारकुशल आदि गुणों को ध्यान में रखते हुए कार्टूनिस्ट का चयन कर नियुक्त किया जाता है। वेतन या पारिश्रमिक पूर्वनिधारित या विशेष परिस्थितियों में अधिक भी दिया जाता है। एक कार्टूनिस्ट के रूप में आरम्भ में कुछ हजार रुपये प्रति माह कमाये जा सकते हैं। निपुणता और अनुभव प्राप्त करने के साथ-साथ अच्छे अवसारों का ध्यान रखा जाए और अपने सम्पर्कों का उपयोग किया जाए तो जल्दी ही अच्छा अवसर मिल सकता है।
कार्टून
पहले विचार के अनुसार 2बी या 4बी नम्बर की काली मुलायम पेंसिल का उपयोग करते हुए सादा सफेद कागज पर रेखांकन किया जाता है। फिर काली वाटरप्रूफ स्याही और ब्रश, होल्डर, क्रोक्विल, पेन, बो पेन, रेपिडोग्राफ, कलम आदि में से एकाधिक का उपयोग करते हुए पर कार्टून बनाए जाते है। रबड़ से पेंसिल की रेखाएं मिटा दी जाती है। आवश्यकतानुसार उनमें उपयुक्त रंग भरे जाते हैं। मूल कार्टून डेढ़-दो गुना बड़ा बनाया जाता है ताकि छपने के बाद वह साफ और अच्छा लगे। कार्टून के एक कोने में कार्टूनिस्ट सुपाठ्य रूप से अपना नाम या हस्ताक्षर अंकित करता है। कार्टून के चारों ओर कागज पर 1 से.मी. या आधा इंच खाली स्थान छोड़ना चाहिए। कार्टून के पीछे भी साफ अक्षरों में अपना पूरा नाम, पता, फोन नम्बर, ई-मेल आदि अवश्य लिखना चाहिए। एक बार में चुनकर 4-5 अच्छे कार्टून भेजने चाहिए। भेजे गये कार्टूनों का विवरण एक कॉपी या रजिस्टर में सुरक्षित रखना चाहिए और उनकी 1-1 फोटो कॉपी भी। अस्वीकृति की स्थिति में कार्टूनों की वापसी के लिए पर्याप्त डाक टिकट-पता युक्त लिफाफा अपने पत्र के साथ संलग्न करना चाहिए। प्रायः 15-30 दिन में स्वीकृति/अस्वीकृति की सूचना मिल जाती है। यदि देर हो जाए ता पूरे संदर्भ के साथ एक स्मरण पत्र भेजना चाहिए। कार्टूनों की स्वीकृति के बाद छपने पर 1-3 माह में नियमानुसार क्रॉस्ड चैक द्वारा भुगतान किया जाता है। कार्टून छपने पर प्राय: सम्बन्धित पत्र-पत्रिका की लेखकीय प्रति भेजी जाती है पर डाक में खो जाने की समस्या को ध्यान में रखते हुए स्वयं एक प्रति खरीद लेनी चाहिए।
कम्प्यूटर का उपयोग करने के लिए उसका आवश्यक प्रशिक्षण ले लेना चाहिए। यह काफी सुविधाजनक और उपयोगी है। इण्टरनेट के प्रयोग से अनेक अन्य सुविधाओं का लाभ मिल जाता है। ई-मेल का उपयोग बेहद आसान, मुफ्त और त्वरित है। अधिकांश जगहों पर इस सुविधा का उपयोग किया जा रहा है।
चित्रकला के विधिवत प्रशिक्षण के लिए समाचार पत्रों में यथा समय विज्ञापन छपते हैं। कला प्रशिक्षण और 4 वर्षीय डिग्री कोर्स बीएफए (बैचलर ऑफ़ फाइन आर्ट्स) करने के लिए महाविद्यालय-
- ललित कला महाविद्यालय (कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स), तिलक मार्ग, नयी दिल्ली-110001
- इंस्टीट्यूट ऑफ़ फाइन आर्ट्स एण्ड डिजाइन, चैन्नेई, तमिलनाडु
- सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स, दादा भाई नौरोजी रोड, मुम्बई, महाराष्ट्र
- फैकल्टी ऑफ़ फाइन आर्ट्स, एम.एस. यूनीर्विसटी, बड़ौदरा, महाराष्ट्र
- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिजाइन, पालदी, अहमदाबाद-380007, गुजरात
आपके आसपास स्थानीय या निकट के विद्यालय या कॉलेज में भी कला प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध हो सकती है, इस बारे में जानकारी प्राप्त कर लें। चाहें तो कला की बारीकियां जानने के लिए किसी कला शिक्षक की सेवाएं ले सकते है। इसके अलावा किसी प्राफेशनल कार्टूनिस्ट से भी सम्पर्क कर आवश्यक जानकारी और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। भविष्य में भी उनके सम्पर्क में बने रहें।
टी.सी. चन्दर,
कार्टूनिस्ट, नयी दिल्ली
सौजन्य: कार्टून इंस्टीट्यूट
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